
लाइफस्टाइल डेस्क। आयुर्वेद में मासिक धर्म को महिला के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी सामान्य और स्वाभाविक शुद्धि प्रक्रिया माना गया है। इस दौरान आहार, दिनचर्या और व्यवहार के नियमों को रजस्वला परिचर्या कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखना और महिला की शारीरिक व मानसिक ऊर्जा को बनाए रखना है।
इस अवधि में हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन लेना चाहिए। जैसे पतला दलिया, मुरमुरा, चावल का मांड, मूंग और सब्जियों का पतला सूप और गुनगुना पानी।
इसके विपरीत भारी, तला-भुना, अत्यधिक ठंडा, तीखा, खट्टा, अधिक नमकीन, तेलयुक्त, बेकरी और जंक फूड से बचना चाहिए। साथ ही भारी व्यायाम, दौड़ना, अधिक शारीरिक काम, लंबी यात्रा, दिन में सोना और मानसिक तनाव से भी बचने की सलाह दी जाती है। पर्याप्त विश्राम, सकारात्मक सोच और शांत मन इस दौरान जरूरी है।
नियमों की अनदेखी से दोषों का असंतुलन और पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इससे कष्टार्तव यानी दर्द के साथ मासिक धर्म, अधिक रक्तस्राव, अल्पार्तव, अनियमित मासिक धर्म, पीसीओडी, एंडोमेट्रियोसिस, पीएमएस और वंध्यत्व जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

Dr. मीनाक्षी चौहान, संहिता एवं सिद्धान्त विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर के अनुसार ये विकार महिला के दैनिक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए रजस्वला परिचर्या का नियमित पालन मासिक धर्म की परेशानियों को कम करने और दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होता है। मासिक धर्म के दौरान संतुलित आहार और विश्राम से वात-पित्त-कफ संतुलित रहते हैं। यह प्रजनन स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए आवश्यक है।