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जबलपुर की हुनरबाज : उम्र को दी मात, कागज से कपड़े तक में उकेरती हैं लोक कथाएं

भारतीय ग्रामीण संस्कृति में रीति चित्रों की एक विशेष पहचान रही है। जन्माष्टमी, दीपावली, करवा चौथ, हल षष्ठी और अन्य पारंपरिक त्योहारों पर महिलाएं घर की...और पढ़ें

By Atul ShuklaEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 29 May 2026 08:57:24 AM (IST)Updated Date: Fri, 29 May 2026 08:57:24 AM (IST)
जबलपुर की हुनरबाज : उम्र को दी मात, कागज से कपड़े तक में उकेरती हैं लोक कथाएं
रीति चित्र परंपरा को सहेजतीं निर्मला। नईदुनिया

HighLights

  1. देश-विदेश से लोग संपर्क कर इस कला को समझने और सीखने की इच्छा जताते हैं
  2. उनके बनाए कई रीति चित्र आज कुंडेश्वर संस्कृत संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं
  3. स्वयं को पुरस्कारों के लिए नामांकित कराने का कभी प्रयास भी नहीं किया

अतुल शुक्ला, नईदुनिया, जबलपुर। जबलपुर के कुण्डेश्वर धाम की 69 साल की निर्मला मिश्रा उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जो बदलते समय में भी भारतीय लोक परंपराओं की लौ जलाए हुए हैं। आज जब आधुनिकता और बाजारवाद के बीच पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, तब निर्मला वर्षों से रीति चित्र जैसी प्राचीन लोक कला को सहेजने का शांत लेकिन महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

गांवों की सांस्कृतिक स्मृतियां जीवित रहती थीं

इन चित्रों में केवल रंग और आकृतियां नहीं होती थीं, बल्कि उनमें लोककथाएं, पारिवारिक भावनाएं, धार्मिक आस्था और गांवों की सांस्कृतिक स्मृतियां जीवित रहती थीं।

लेकिन मैंने इस कला को मिटने नहीं दिया

वे बताती हैं कि समय बदला, बाजार में पोस्टर और प्रिंटेड तस्वीरों का दौर आया और धीरे-धीरे यह परंपरा लोगों की दिनचर्या से दूर होती चली गई, लेकिन मैंने इस कला को मिटने नहीं दिया। वे आज भी बच्चों और युवाओं को रीति चित्रों की परंपरा, उनसे जुड़ी कथाएं और त्योहारों के सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताती हैं।


हमारी लोक संस्कृति की जीवित धरोहर

उनके बनाए कई रीति चित्र आज कुंडेश्वर संस्कृत संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं। यह संग्रह केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति की जीवित धरोहर माना जाता है। उनके कार्य के प्रति लोगों की बढ़ती रुचि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश-विदेश से लोग उनसे संपर्क कर इस कला को समझने और सीखने की इच्छा जताते हैं।

लोक कला के प्रति उनका समर्पण लगातार बना हुआ है

निर्मला जी का काम भले ही बड़े मंचों और पुरस्कारों की दौड़ से दूर रहा हो, लेकिन उनकी कला को पहचान जरूर मिली है। डीडी नेशनल, संसद टीवी, अमर उजाला और टाइम्स नाउ नवभारत जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर उनके कार्य को स्थान मिल चुका है। स्वास्थ्य कारणों से वे बहुत कम बाहर जा पाती हैं और उन्होंने कभी स्वयं को पुरस्कारों के लिए नामांकित कराने का प्रयास भी नहीं किया। बावजूद इसके, लोक कला के प्रति उनका समर्पण लगातार बना हुआ है।

ताकि यह परंपरा समय के साथ नई पहचान बना सके

इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में उनके भतीजे निखिल मिश्रा भी सहयोग कर रहे हैं। डिजिटल पेंटिंग से जुड़े निखिल आधुनिक माध्यमों के जरिए रीति चित्र कला को युवाओं तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि यह परंपरा समय के साथ नई पहचान बना सके।

धार्मिक आस्था संग पारंपरिक शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण

निर्मला मिश्रा सावन माह में पार्थिव शिवलिंग निर्माण की परंपरा को भी आगे बढ़ा रही हैं। मिट्टी से बनाए गए उनके सुंदर शिवलिंग धार्मिक आस्था के साथ-साथ पारंपरिक शिल्पकला का भी अद्भुत उदाहरण हैं। निर्मला मिश्रा जी का जीवन यह संदेश देता है कि संस्कृति केवल किताबों में दर्ज इतिहास नहीं होती, बल्कि वह जीवंत परंपरा है, जिसे कुछ समर्पित लोग अपने हाथों और अपने संस्कारों से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाते हैं।

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