
लाइफस्टाइल डेस्क। शायद मेरे छोटे कद और मृदुभाषी होने की वजह से लोग यह मान लेते हैं कि मैं दृढ़ नहीं हो सकता। शारीरिक रूप से बलवान न होते हुए भी, मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर नहीं हूं।
साल 1956 में एक रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा देते समय लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा कहे गए ये शब्द उनके साहस, नैतिक मूल्यों और सच्चाई को दर्शाते हैं।
2 अक्टूबर 2026 को भारत देश अपने दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की 122वीं जयंती मना रहा है। 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश में वाराणसी से सात मील दूर मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी और राष्ट्र-समर्पण की अद्वितीय मिसाल है। इस खआस अवसर पर जानेंगे शास्त्री जी के बारे में 10 बातें-
शास्त्री जी अपने परिवार में सबसे छोटे थे, इसलिए उन्हें प्यार से 'नन्हें' कहा जाता था। जब वे मात्र डेढ़ साल के थे, तब उनके शिक्षक पिता का निधन हो गया। 20 साल की आयु में विधवा हुई उनकी माता अपने तीनों बच्चों को लेकर अपने पिता के घर चली गईं, जहां उनका बचपन कई मुश्किलों में बीता।
अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्हें अपने चाचा के पास वाराणसी जाना पड़ा। गरीबी का आलम यह था कि प्रचंड गर्मी में तपती सड़कों पर नंगे पैर कई किलोमीटर पैदल चलकर वे स्कूल जाया करते थे।
महज 11 साल की उम्र से ही राष्ट्रसेवा का सपना देखने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने 16 साल की आयु में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1921) में भाग लेने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी। परिवार की चिंताओं के बावजूद वे स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते पर अडिग रहे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि 'शास्त्री' उनका जातिगत उपनाम (Surname) नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक उपाधि है। साल 1926 में वाराणसी के काशी विद्यापीठ से दर्शनशास्त्र और नैतिकता में प्रथम श्रेणी में स्नातक (Bachelor's Degree) की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि मिली, जो सदा के लिए उनके नाम का हिस्सा बन गई।
साल 1927 में ललिता देवी के साथ विवाह के दौरान उन्होंने दहेज प्रथा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दहेज के रूप में केवल एक चरखा और कुछ गज हाथ से काता हुआ सूती कपड़ा ही स्वीकार किया।
साल 1930 में महात्मा गांधी के दांडी नमक सत्याग्रह से जुड़कर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजों के खिलाफ विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अपने जीवन के 7 साल ब्रिटिश जेलों में बिताए।
आजादी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में संसदीय सचिव और गृह मंत्री रहने के बाद 1951 में वे केंद्रीय राजनीति में आए। उन्होंने रेल, परिवहन, वाणिज्य एवं उद्योग तथा गृह मंत्रालय का कार्यभार संभाला। 27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के पश्चात आम सहमति से 9 जून 1964 को उन्होंने भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और देश में पड़े भयंकर सूखे के समय उन्होंने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया। उन्होंने हरित क्रांति और श्वेत क्रांति (दुग्ध उत्पादन) को अभूतपूर्व प्रोत्साहन दिया। गृह मंत्री रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की पहली जांच समिति (संथानम समिति) का गठन भी किया था।
प्रधानमंत्री बनने पर परिवार के आग्रह पर उन्होंने 12,000 रुपए में एक फिएट (Fiat) कार खरीदी थी। उनके बैंक खाते में केवल 7,000 रुपए थे, इसलिए बाकी 5,000 रुपए का उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से लोन लिया था। यह कार आज भी नई दिल्ली स्थित शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद (तत्कालीन सोवियत संघ) में 'ताशकंद समझौते' पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद रहस्यमयी परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद कार के बकाया 5,000 रुपए के बैंक ऋण को उनकी धर्मपत्नी ललिता देवी ने अपनी सरकारी पेंशन से पाई-पाई करके चुकाया।