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मेनोपॉज समझकर नजरअंदाज करती रही थकान, बाद में बाहर आई एक गंभीर बीमारी…महिलाओं को इस बात का ध्यान रखना जरूरी

ब्रिटेन की सारा चैपमैन लगातार थकान और कमजोरी को केवल उम्र या मेनोपॉज मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। उन्हें ल्यूकेमिया था। जानें इसके के प्रकार,...और पढ़ें

By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Sun, 13 Sep 2026 03:43:48 PM (IST)Updated Date: Sun, 13 Sep 2026 03:43:48 PM (IST)
मेनोपॉज समझकर नजरअंदाज करती रही थकान, बाद में बाहर आई एक गंभीर बीमारी…महिलाओं को इस बात का ध्यान रखना जरूरी
मेनोपॉज समझकर नजरअंदाज की गई थकान निकली ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया)। (एआई जनरेटेड)

हेल्थ डेस्क, नई दिल्ली। लगातार थकान को अक्सर उम्र बढ़ने, तनाव या महिलाओं में मेनोपॉज से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अगर थकान लंबे समय तक बनी रहे और इसके साथ बार-बार इन्फेक्शन, रात में पसीना आना, घाव का देर से भरना या खून की जांच में असामान्य बदलाव नजर आएं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ब्रिटेन की रहने वाली सारा चैपमैन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वह पहले काफी एक्टिव थीं, हॉकी खेलती थीं और नियमित रूप से ब्लडदान करती थीं। लेकिन 2011 में उन्हें अचानक पहले से कहीं ज्यादा थकान महसूस होने लगी। वह बार-बार बीमार पड़ने लगीं, उन्हें सीने में इन्फेक्शन होने लगा और घाव भी सामान्य से ज्यादा समय लेने लगे।


सारा के मुताबिक, उन्होंने कई डॉक्टर्स से सलाह ली, लेकिन उनके लक्षणों को उम्र बढ़ने और मेनोपॉज से जोड़कर देखा गया।

चलने तक में होने लगी परेशानी

समय के साथ उनकी हालत बिगड़ती गई। उनका हीमोग्लोबिन इतना कम हो गया कि वह ब्लड डोनेट तक नहीं कर सकीं। इसके अलावा रात में पसीना आने और त्वचा से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ने लगीं। एक वॉकिंग हॉलिडे के दौरान उनकी परेशानी इतनी बढ़ गई कि कुछ कदम चलना भी मुश्किल हो गया। इसके बाद हुई जांच में खून की एक असामान्यता सामने आई।

2013 में सारा को मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम (MDS) का पता चला। यह ऐसी स्थिति है जिसमें बोन मैरो यानी अस्थिमज्जा सामान्य तरीके से स्वस्थ ब्लड सेल्स नहीं बना पाती। उन्हें बताया गया कि यह बीमारी आगे चलकर ल्यूकेमिया में बदल सकती है।

इसके बाद उनकी नियमित ब्लड टेस्ट और बोन मैरो बायोप्सी होती रही। जून 2016 में उन्हें एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया (AML) का पता चला।

क्या होता है ल्यूकेमिया?

ल्यूकेमिया एक प्रकार का ब्लड कैंसर है, जो मुख्य रूप से खून बनाने वाले टीशूज और बोन मैरो को प्रभावित करता है। इस बीमारी में असामान्य ब्लड सेल्स तेजी से बढ़ने लगती हैं और शरीर में स्वस्थ लाल ब्लड सेल्स, सफेद ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स के सामान्य निर्माण में बाधा डाल सकती हैं। इसी वजह से व्यक्ति को थकान, बार-बार इन्फेक्शन और खून बहने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

ल्यूकेमिया कितने प्रकार का होता है?

ल्यूकेमिया को मुख्य रूप से इस आधार पर बांटा जाता है कि बीमारी कितनी तेजी से बढ़ती है और कौन-सी ब्लड सेल्स प्रभावित होती हैं। एक्यूट ल्यूकेमिया तेजी से बढ़ता है और इसमें जल्द इलाज की जरूरत होती है। इसके प्रमुख प्रकार हैं-

  • Acute Lymphoblastic Leukaemia (ALL)
  • Acute Myeloid Leukaemia (AML)

वहीं क्रॉनिक ल्यूकेमिया आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ता है। इसके प्रमुख प्रकार हैं-

  • Chronic Lymphocytic Leukaemia (CLL)
  • Chronic Myeloid Leukaemia (CML)

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

ल्यूकेमिया के लक्षण हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते। कुछ मामलों में ये धीरे-धीरे सामने आते हैं, जबकि कुछ लोगों में तेजी से दिखाई दे सकते हैं।

इन लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है-

  • लगातार या बिना वजह होने वाली थकान
  • कमजोरी
  • बार-बार इन्फेक्शन होना
  • लगातार बुखार या रात में ज्यादा पसीना आना
  • त्वचा का पीला पड़ना
  • बिना वजह वजन कम होना या भूख कम लगना
  • आसानी से चोट लगना
  • बार-बार नाक या मसूड़ों से खून आना
  • घाव का देर से भरना
  • लिम्फ नोड्स में सूजन
  • हड्डियों या जोड़ों में दर्द
  • सांस लेने में परेशानी
  • सिरदर्द या चक्कर आना

हालांकि, इन लक्षणों का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को ल्यूकेमिया ही है। कई दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं में भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं।

MDS और ल्यूकेमिया का क्या संबंध है?

सारा के मामले में पहले MDS का पता चला और बाद में यह AML में बदल गया। Myelodysplastic Syndromes (MDS) ऐसी बीमारियों का समूह है जिसमें बोन मैरो सामान्य ब्लड सेल्स बनाने में ठीक से काम नहीं करता। कुछ मामलों में MDS आगे चलकर AML में बदल सकता है।

इसी वजह से खून की जांच में लगातार असामान्य बदलाव मिलने पर डॉक्टर नियमित निगरानी, ब्लड टेस्ट और जरूरत पड़ने पर बोन मैरो जांच की सलाह दे सकते हैं।

ल्यूकेमिया क्यों होता है?

ज्यादातर मामलों में ल्यूकेमिया का कोई एक स्पष्ट कारण नहीं होता। यह तब विकसित हो सकता है जब ब्लड बनाने वाली कोशिकाओं में ऐसे आनुवंशिक बदलाव हो जाएं, जिससे वे असामान्य तरीके से बढ़ने और विभाजित होने लगें।

कुछ चीजें इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं, जैसे-

  • बढ़ती उम्र
  • कुछ आनुवंशिक स्थितियां
  • पहले की कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी
  • ज्यादा मात्रा में रेडिएशन के संपर्क में आना
  • कुछ रसायनों, जैसे बेंजीन, के संपर्क में आना
  • धूम्रपान, जिसका AML के बढ़े हुए जोखिम से संबंध पाया गया है

हालांकि, किसी जोखिम कारक का होना यह तय नहीं करता कि व्यक्ति को ल्यूकेमिया जरूर होगा। कई लोगों में बीमारी के पीछे कोई स्पष्ट जोखिम कारक नहीं मिलता।

शरीर पर क्या असर डाल सकता है?

ल्यूकेमिया में स्वस्थ ब्लड सेल्स की कमी होने से कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं। लाल ब्लड सेल्स कम होने पर गंभीर एनीमिया हो सकता है, जिससे बहुत ज्यादा थकान और सांस फूलने की समस्या हो सकती है। सफेद ब्लड सेल्स की कमी शरीर की इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।

वहीं प्लेटलेट्स कम होने पर आसानी से चोट लग सकती है और गंभीर मामलों में खून बहने का खतरा बढ़ सकता है।

बीमारी बढ़ने पर असामान्य कोशिकाएं बोन मैरो के बाहर दूसरे अंगों और ऊतकों को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा, इलाज के दौरान दी जाने वाली कीमोथेरेपी से कमजोरी, मतली, बाल झड़ना, कम ब्लड काउंट और इन्फेक्शन का खतरा बढ़ना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

लगातार रहने वाली असामान्य थकान या बार-बार होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को केवल उम्र, तनाव या मेनोपॉज मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

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