
हेल्थ डेस्क। सर्दियों की शुरुआत से पहले का समय पहाड़ों की सैर और कई ट्रेकिंग रूट्स के लिए अच्छा माना जाता है। मानसून के बाद आसमान साफ होने लगता है और पहाड़ों से दूर तक के खूबसूरत नजारे दिखाई देते हैं। यही वजह है कि इस दौरान बड़ी संख्या में लोग हिमालय और दूसरे पहाड़ी इलाकों में ट्रेकिंग और माउंटेन क्लाइंबिंग का प्लान बनाते हैं। हालांकि, पहाड़ों पर चढ़ना सिर्फ घूमने-फिरने का शौक नहीं, बल्कि शारीरिक क्षमता, सही ट्रेनिंग और सुरक्षा से जुड़ी गतिविधि है। अगर आप भी इस मौसम में पहाड़ों पर चढ़ाई करने की सोच रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
माउंटेन क्लाइंबिंग में शरीर को सामान्य दिनों से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। लंबे समय तक चलना, ऊंचाई पर चढ़ना और भारी सामान उठाना थकान बढ़ा सकता है। इसलिए यात्रा से पहले पैदल चलने, सीढ़ियां चढ़ने और हल्की एक्सरसाइज की आदत डालें। अगर आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही यात्रा की योजना बनाएं।
पहाड़ों का मौसम तेजी से बदल सकता है। सुबह धूप होने के बावजूद कुछ ही समय में बारिश, बर्फबारी या तेज हवाएं चल सकती हैं। इसलिए निकलने से पहले मौसम का पूर्वानुमान और स्थानीय प्रशासन की एडवाइजरी जरूर देखें। जिस रास्ते पर जाने की योजना है, वहां की स्थिति और कठिनाई के बारे में भी जानकारी लें।
ट्रेकिंग और माउंटेन क्लाइंबिंग दोनों अलग-अलग गतिविधियां हैं। सामान्य ट्रेकिंग के लिए भी तैयारी जरूरी है, लेकिन तकनीकी चढ़ाई में रस्सियों, हार्नेस, हेलमेट और दूसरे उपकरणों का सही इस्तेमाल आना चाहिए। पहली बार जा रहे हैं तो अनुभवी गाइड या प्रमाणित प्रशिक्षक की मदद लें। अपनी क्षमता से ज्यादा कठिन रास्ता चुनना जोखिम भरा हो सकता है।
पहाड़ों पर सामान्य स्पोर्ट्स शूज हमेशा पर्याप्त नहीं होते। रास्ते की स्थिति के अनुसार अच्छी ग्रिप वाले ट्रेकिंग या क्लाइंबिंग शूज चुनें। ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़ों की कई परतें पहनें। इसके अलावा रेन जैकेट, दस्ताने, टोपी और अतिरिक्त मोजे भी साथ रखें। कपड़े ऐसे हों जो शरीर को गर्म रखने के साथ पसीने और नमी से भी बचा सकें।
जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, हवा में ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होती जाती है। ऐसे में कुछ लोगों को सिरदर्द, चक्कर, उल्टी, थकान और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। इसे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस कहा जाता है। इसलिए बहुत तेजी से ऊंचाई पर न चढ़ें और शरीर को नए वातावरण के अनुकूल होने का समय दें। भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन भी 2,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर धीरे-धीरे चढ़ने और पर्याप्त समय तक अनुकूलन करने की सलाह देता है।
चढ़ाई के दौरान शरीर को ऊर्जा और पानी की जरूरत होती है। इसलिए पर्याप्त पानी, हल्के स्नैक्स, ड्राई फ्रूट्स और जरूरी भोजन साथ रखें। इसके अलावा फर्स्ट एड किट, अपनी नियमित दवाएं, टॉर्च, पावर बैंक और जरूरी इमरजेंसी नंबर भी रखें। दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में मेडिकल सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं।
पहली बार पहाड़ों पर चढ़ाई कर रहे हैं तो अकेले जाने की गलती न करें। अनुभवी गाइड और भरोसेमंद समूह के साथ जाएं। तकनीकी चढ़ाई के दौरान हेलमेट, हार्नेस, रस्सी और अन्य सुरक्षा उपकरणों का सही इस्तेमाल जरूरी है। इन उपकरणों की गुणवत्ता और स्थिति की जांच भी पहले कर लें।
अगर चढ़ाई के दौरान तेज सिरदर्द, लगातार उल्टी, भ्रम, लड़खड़ाहट या आराम करते समय भी सांस लेने में परेशानी हो, तो इसे सामान्य थकान समझकर आगे न बढ़ें। तुरंत चढ़ाई रोकें और गाइड को बताएं। लक्षण गंभीर हों या बढ़ रहे हों तो सुरक्षित तरीके से कम ऊंचाई पर उतरें और तुरंत मेडिकल सहायता लें। ऊंचाई से जुड़ी बीमारी को नजरअंदाज करना जानलेवा हो सकता है।
माउंटेन क्लाइंबिंग में रोमांच के साथ जोखिम भी जुड़ा होता है। इसलिए सिर्फ सोशल मीडिया पर खूबसूरत तस्वीरें देखकर किसी कठिन ट्रेक या चढ़ाई का चुनाव न करें। अपनी फिटनेस, अनुभव, मौसम और रास्ते की स्थिति को ध्यान में रखकर ही प्लान बनाएं। पहाड़ों पर पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी सुरक्षित वापस लौटना भी है।
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