
लाइफस्टाइल डेस्क: परीक्षा की तैयारी में जुटे रिषभ की किताबें खुली हैं, लेकिन उसका दिमाग जैसे जाम हो चुका है। तैयारी पूरी है, रिवीजन तय शेड्यूल पर चल रहा है, फिर भी चेहरे से मुस्कान गायब है। रिषभ के माता-पिता अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से लगातार यही कहते रहते हैं कि इस बार उनका बेटा पूरे परिवार में सबसे ज्यादा अंक लाएगा। रिषभ सामने से मुस्कुरा देता है, लेकिन भीतर ही भीतर डर से जूझ रहा है।

रिषभ ने यह बात अपने कोचिंग संस्थान के शिक्षक से साझा की कि उसे परीक्षा से ज्यादा डर माता-पिता की उम्मीदों का लगता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, कम समय में ज्यादा सीखने का दबाव और उस पर परिवार की अपेक्षाएं—इन सबने मिलकर छात्रों को मानसिक तनाव में डाल दिया है।
यह स्थिति केवल एक छात्र की नहीं है। द स्टूडेंट सिंक इंडेक्स-2026 (Student Sync Index 2026) की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा में बैठे हर 10 में से 6 विद्यार्थी तनावग्रस्त रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रोजाना 63 प्रतिशत छात्र तनाव महसूस करते हैं, जिनमें से 42 प्रतिशत ने स्वीकार किया कि इस दबाव का कारण माता-पिता की उम्मीदें भी हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि शिक्षक बच्चों के तनाव को पहचान तो लेते हैं, लेकिन उनके पास समाधान सीमित हैं। स्कूल काउंसलर और शिक्षक विद्यार्थियों को समझा सकते हैं, मगर माता-पिता के व्यवहार में बदलाव उनके नियंत्रण में नहीं होता। कई बार अभिभावक यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि वे अनजाने में बच्चों पर दबाव डाल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल धीरे-धीरे ‘विद्या के मंदिर’ की जगह ‘प्रतिस्पर्धा के कुरुक्षेत्र’ बनते जा रहे हैं। लगभग आधे बच्चे अपने ही घर को मानसिक सुरक्षा की जगह दबाव का केंद्र मानने लगे हैं। बच्चों को एक निवेश की तरह देखा जाने लगा है, जिससे भविष्य में बेहतर परिणाम की उम्मीद की जाती है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि माता-पिता बच्चों से दिन में कम से कम एक बार पढ़ाई से अलग विषयों पर बात करें। मेहनत की सराहना करें, केवल अंकों की नहीं। तुलना से बचें और बच्चों के व्यवहार, नींद और भूख में हो रहे बदलावों पर ध्यान दें। जब तक घर और स्कूल ‘गलती करने की स्वतंत्रता’ नहीं देंगे, तब तक तनाव का यह ग्राफ नीचे नहीं आएगा।