
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। गणपति बप्पा की विदाई का दृश्य आते ही आंखों के सामने नदी, तालाब या अन्य जलस्रोत में प्रतिमा विसर्जन की तस्वीर उभरती है। ढोल-नगाड़ों के बीच भक्त बप्पा को विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं। लेकिन संस्कारधानी के कुछ परिवारों ने इस परंपरा को एक अलग ही भाव दिया है। यहां बप्पा विदाई के बाद भी घर से दूर नहीं जाते।
वे मिट्टी में मिलकर फिर उसी आंगन में पौधे के रूप में लौटते हैं। किसी घर में तुलसी की हरियाली बनकर तो कहीं गेंदा के फूलों की मुस्कान बनकर। शहर के कुछ परिवार पिछले करीब दस वर्षों से गणपति प्रतिमा का विसर्जन जलस्रोतों में करने के बजाय घर में ही कर रहे हैं।
इसके लिए बड़े पात्र, गमले या घर के आंगन में मिट्टी से भरा स्थान तैयार किया जाता है। मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा को इसी में विसर्जित किया जाता है। प्रतिमा धीरे-धीरे मिट्टी में मिल जाती है। इसके साथ रखे गए तुलसी, गेंदा और अन्य पौधों के बीज कुछ समय बाद अंकुरित होते हैं और देखते ही देखते उसी स्थान पर हरियाली दिखाई देने लगती है।
संजीवनी नगर निवासी जोशी परिवार ने बताया कि प्रतिमा का मिट्टी में मिलना बप्पा की विदाई नहीं, बल्कि उनके नए रूप में लौटने की शुरुआत है। दस दिनों तक पूजा-अर्चना, आरती और भक्ति के बाद विसर्जन की घड़ी आती है तो परिवार पूरे विधि-विधान से प्रतिमा को घर में ही मिट्टी में समाहित करता है।
बच्चों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। प्रतिमा के साथ बीज डालने का उद्देश्य केवल पौधा उगाना नहीं है, बल्कि बप्पा की स्मृति को घर में जीवित रखना भी है। जब कुछ दिनों बाद मिट्टी से नन्हा पौधा बाहर निकलता है तो बच्चों के चेहरे पर अलग ही उत्साह दिखाई देता है।
वे उसे बप्पा का आशीर्वाद मानकर उसकी देखभाल करते हैं। इन घरों में विसर्जन के बाद उगने वाले पौधे भी अपने आप में खास होते हैं। कहीं तुलसी का पौधा उगता है, तो कहीं गेंदा के फूल खिलते हैं। कुछ परिवार अपनी पसंद के दूसरे पौधों के बीज भी मिट्टी में डालते हैं। पौधे के बड़ा होने के साथ घर के आंगन में हरियाली बढ़ती जाती है।
परिवारों के लिए यह केवल एक पौधा नहीं होता, बल्कि गणेश उत्सव से जुड़ी भावनाओं की निशानी बन जाता है। बच्चे जब पौधे में फूल खिलते देखते हैं तो उन्हें सहज रूप से याद आता है कि इसी मिट्टी में उनके बप्पा की प्रतिमा विसर्जित हुई थी। इस तरह दस दिन का उत्सव पूरे वर्ष प्रकृति से जुड़े रहने का माध्यम बन जाता है।
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अधारताल निवासी मिश्रा परिवार के सदस्यों के अनुसार इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष बच्चों से भी जुड़ा है। आज जब बच्चे मोबाइल और डिजिटल गतिविधियों में अधिक समय बिताते हैं, ऐसे में गणेश उत्सव के माध्यम से उन्हें मिट्टी, बीज और पौधों से जोड़ना परिवारों के लिए एक संस्कार जैसा है।
बच्चे स्वयं पौधे को पानी देते हैं, उसकी बढ़त देखते हैं और फूल आने पर खुश होते हैं। उन्हें यह समझ आता है कि मिट्टी केवल प्रतिमा बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को जन्म देने वाली धरती भी है। धार्मिक आयोजन यदि बच्चों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी सिखाएं तो इसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है।
घर में विसर्जन करने वाले परिवारों का कहना है कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। भगवान गणेश को प्रकृति और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है, ऐसे में उनके उत्सव को प्रकृति के संरक्षण से जोड़ना उन्हें सार्थक लगता है।

पर्यावरण विद् एचबी पालन ने कहा कि मिट्टी की प्रतिमा को घर में ही विसर्जित करने से जलस्रोतों में प्रतिमा विसर्जन से होने वाले संभावित प्रदूषण को कम करने का संदेश मिलता है। साथ ही पूजा के बाद फूल-माला और अन्य जैविक सामग्री का भी उचित तरीके से उपयोग किया जा सकता है।
परिवारों का प्रयास है कि उत्सव की खुशी के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी निभाई जाए। शुरुआत में घर में विसर्जन करने का विचार कुछ परिवारों के लिए नया था। धीरे-धीरे जब मिट्टी में मिली प्रतिमा के बाद पौधे उगने लगे तो इस प्रक्रिया से भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता गया।
अब कई परिवार इसे गणेश उत्सव की अपनी स्थायी परंपरा का हिस्सा मानते हैं। इन परिवारों के लिए गणपति बप्पा को विदा करने का अर्थ उन्हें घर से बाहर भेजना नहीं है। उनका विश्वास है कि बप्पा मिट्टी में समाकर फिर उसी घर की मिट्टी से जीवन का संदेश देते हैं। विसर्जन के बाद जब तुलसी की पत्तियां लहराती हैं या गेंदा के फूल खिलते हैं तो उन्हें लगता है कि बप्पा फिर लौट आए हैं।