
लाइफस्टाइल डेस्क। किसी शहर में अलग-अलग समुदायों का अलग बस्तियों में रहना, एक ही वर्ग के लोगों का एक इलाके तक सीमित हो जाना या समाज के कुछ हिस्सों का बाकी दुनिया से कट जाना- इन स्थितियों को समझने के लिए ‘गेटो’ और ‘गेटोइजेशन’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन इनका इतिहास क्या है, गेटोइज्म का मतलब क्या होता है और आज इस पर चर्चा क्यों हो रही है?
मनोरंजन, राजनीति या समाज से जुड़ी चर्चाओं में कई अंग्रेजी शब्द तेजी से लोकप्रिय हो जाते हैं। ‘गेटोइज्म’ भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल सामाजिक अलगाव और समुदायों के सीमित दायरों में सिमटने के संदर्भ में किया जा सकता है। हालांकि, इस शब्द का अर्थ केवल किसी खास इलाके में रहने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे इतिहास, भेदभाव, आर्थिक असमानता और सामाजिक दूरी जैसी कई परतें जुड़ी हैं।
‘गेटोइज्म’ (Ghettoism) का सामान्य अर्थ किसी क्षेत्र को अलग-अलग गेटो में बांटने या गेटो जैसी व्यवस्था बनाने से जुड़ा है। वहीं, ‘गेटोइजेशन’ (Ghettoization) उस प्रोसेस को कहते हैं, जिसमें किसी समुदाय या समूह के लोगों का एक खास इलाके, सामाजिक दायरे या पहचान तक सीमित हो जाना शामिल है। यह स्थिति कई बार लोगों की अपनी पसंद से बनती है, लेकिन कई मामलों में सामाजिक दबाव, भेदभाव, आर्थिक मजबूरी या प्रशासनिक नीतियां भी इसके पीछे होती हैं।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी समुदाय के लोगों को मकान किराये पर लेने में भेदभाव का सामना करना पड़े और वे मजबूरी में एक ही इलाके में रहने लगें, तो यह आवासीय अलगाव का उदाहरण हो सकता है। इसी तरह, किसी समूह को उसकी पहचान के आधार पर बाकी समाज से अलग रखना भी गेटोइजेशन की प्रोसेस का हिस्सा हो सकता है।
हालांकि, किसी इलाके में एक ही समुदाय के लोगों का अधिक संख्या में रहना अपने आप में गेटोइज्म नहीं है। इसके पीछे की परिस्थितियां, लोगों की पसंद और उन पर मौजूद सामाजिक दबाव को समझना जरूरी है।
‘गेटो’ शब्द का इतिहास 16वीं सदी के इटली से जुड़ा है। वर्ष 1516 में वेनिस के अधिकारियों ने यहूदी समुदाय के लोगों को शहर के एक निर्धारित इलाके में रहने के लिए सीमित कर दिया था। इस इलाके को वेनिस का यहूदी गेटो कहा गया। यहां रहने वाले लोगों की आवाजाही और दूसरे समुदायों के साथ उनके संपर्क पर पाबंदियां थीं। इसी ऐतिहासिक व्यवस्था से ‘गेटो’ शब्द का संबंध स्थापित हुआ।
बाद में इस शब्द का इस्तेमाल दूसरे शहरों में उन इलाकों के लिए भी होने लगा, जहां किसी खास नस्ल, धर्म या अल्पसंख्यक समुदाय के लोग सामाजिक और आर्थिक दबावों के कारण बड़ी संख्या में रहते थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी शासन ने यूरोप में यहूदी आबादी को अलग-अलग गेटो में कैद किया। ये इलाके अमानवीय परिस्थितियों, भूख, बीमारियों और उत्पीड़न के केंद्र बन गए। इस इतिहास ने ‘गेटो’ शब्द को केवल किसी बस्ती का नाम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे जबरन अलगाव और भेदभाव के प्रतीक के रूप में भी स्थापित कर दिया।
आज गेटोइजेशन की चर्चा शहरीकरण, आवास, नस्लीय और धार्मिक भेदभाव, आर्थिक असमानता तथा सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों के संदर्भ में होती है। कई शहरों में लोगों की आय, धर्म, जातीय पहचान या सामाजिक स्थिति के आधार पर आवासीय बस्तियां अलग-अलग रूप ले लेती हैं। जब यह अलगाव अवसरों, सुविधाओं और सामाजिक संपर्क तक पहुंच को प्रभावित करने लगता है, तब यह गंभीर सामाजिक मुद्दा बन जाता है।
इस विषय पर चर्चा बढ़ने की एक वजह यह भी है कि शहरों में मकान किराये पर देने, पड़ोस चुनने, स्कूलों तक पहुंच और सार्वजनिक सुविधाओं के वितरण में होने वाले भेदभाव पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया के दौर में ‘गेटो’ शब्द का इस्तेमाल कई बार राजनीतिक बहसों और सांस्कृतिक चर्चाओं में भी होता है। हालांकि, किसी खास समुदाय या इलाके को बिना ठोस आधार के ‘गेटो’ कहना उस समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह बढ़ा सकता है।
अमेरिका में इस शब्द का इस्तेमाल नस्लीय अलगाव और अश्वेत समुदायों के साथ हुए आवासीय भेदभाव को समझाने के लिए भी किया गया। वहां लंबे समय तक चली भेदभावपूर्ण आवास नीतियों ने कई समुदायों को खास इलाकों तक सीमित करने में भूमिका निभाई। इस वजह से गेटोइजेशन को केवल गरीबी नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत असमानता से जोड़कर भी देखा जाता है।
किसी इलाके में एक ही धर्म, भाषा, जाति या सांस्कृतिक पहचान के लोगों का साथ रहना जरूरी नहीं कि सामाजिक अलगाव का संकेत हो। लोग समान भाषा, खानपान, धार्मिक स्थलों, पारिवारिक संबंधों या सामुदायिक सहयोग के कारण भी एक जगह रहना पसंद कर सकते हैं।
गेटोइजेशन को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या लोगों के पास दूसरे इलाकों में रहने और आगे बढ़ने के बराबर अवसर हैं, क्या वे भेदभाव का सामना कर रहे हैं और क्या उनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति उन्हें एक सीमित दायरे में रहने के लिए मजबूर करती है।
इसलिए गेटोइज्म की चर्चा केवल बस्तियों या इलाकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके जरिए यह समझने की कोशिश की जाती है कि समाज में अलगाव कैसे पैदा होता है, किन परिस्थितियों में मजबूत होता है और इसका असर लोगों के अवसरों, अधिकारों तथा आपसी संबंधों पर किस तरह पड़ता है।
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