
लाइफस्टाइल डेस्क। किसी से उसके पसंदीदा कपड़ों के बारे में पूछना, शादी कब करोगे यह जानना या उसके पार्टनर के बारे में बात करना आम बातचीत का हिस्सा हो सकता है। लेकिन LGBTQ समुदाय के कई लोगों के लिए ऐसे ही सवाल असहजता और तनाव की वजह बन जाते हैं। इसकी वजह यह है कि उन्हें कई बार अपनी पहचान बताने से पहले सामने वाले की सोच और प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाना पड़ता है। घर में अलग व्यवहार, दोस्तों के बीच अलग पहचान और ऑफिस में अपनी निजी जिंदगी को लेकर चुप्पी बनाए रखना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सकता है।
सवाल यह है कि आखिर किसी की पसंद, पहचान या प्यार का तरीका दूसरे लोगों को इतना परेशान क्यों करता है? लोग LGBTQ समुदाय को स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? इसके पीछे सिर्फ सामाजिक परंपराएं नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग की कुछ मनोवैज्ञानिक आदतें भी काम करती हैं। इसका असर उन लोगों की मानसिक सेहत पर भी पड़ सकता है, जिन्हें अपनी पहचान के साथ सहज होकर जीने का मौका नहीं मिलता।
साइकोलॉजी के मुताबिक, इंसान अक्सर उन्हीं चीजों को आसानी से स्वीकार करता है, जिन्हें वह बचपन से देखता और समझता आया है। परिवार, स्कूल, समाज और आसपास का माहौल उसकी सोच बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई लोगों को बचपन से यही समझाया जाता है कि लड़का और लड़की ही एक-दूसरे के जीवनसाथी होते हैं और शादी, परिवार तथा रिश्तों का एक तय तरीका होता है।
जब उनके सामने इससे अलग कोई पहचान या रिश्ता आता है, तो वे उसे समझने के बजाय अपनी पुरानी मान्यताओं से तुलना करने लगते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि जो चीज उनकी परवरिश और सामाजिक मान्यताओं से अलग है, वह गलत भी हो सकती है। इसी सोच से पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है।
इसके अलावा समाज में लोगों को दूसरों की राय का भी डर रहता है। कई लोग खुद किसी LGBTQ व्यक्ति के प्रति नकारात्मक सोच नहीं रखते, लेकिन परिवार या समाज के विरोध के डर से खुलकर समर्थन नहीं करते। यानी कई बार व्यक्ति की निजी सोच और उसका सार्वजनिक व्यवहार अलग-अलग हो सकता है।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, किसी LGBTQ+ व्यक्ति से व्यक्तिगत परिचय और उसके साथ सामान्य सामाजिक संपर्क पूर्वाग्रह कम करने में मदद कर सकता है। जब लोग किसी समुदाय को केवल एक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि अपने दोस्त, सहकर्मी या परिवार के सदस्य के रूप में जानते हैं, तो उनके नजरिए में बदलाव आ सकता है।
LGBTQ समुदाय के कई लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ दूसरों का विरोध नहीं, बल्कि अपनी पहचान को लेकर लगातार सतर्क रहना भी है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपने परिवार के सामने अपने पार्टनर का जिक्र करने से बच सकता है। कोई ऑफिस में निजी जिंदगी से जुड़े सवालों का जवाब टाल सकता है। वहीं, कुछ लोग कपड़ों, बोलने के तरीके या अपने व्यवहार को लेकर भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि कहीं कोई उनका मजाक न उड़ाए।
साइकोलॉजी में इस तरह के अतिरिक्त दबाव को ‘माइनॉरिटी स्ट्रेस’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि किसी ऐसे सामाजिक समूह का हिस्सा होने के कारण पैदा होने वाला अतिरिक्त तनाव, जिसे भेदभाव, अस्वीकार या अपमान का सामना करना पड़ता है।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, अपनी पहचान छिपाने का दबाव, दूसरों से अस्वीकार किए जाने का डर और भेदभाव का अनुभव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इससे चिंता, तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। यानी परेशानी किसी की पहचान में नहीं, बल्कि उसके आसपास मौजूद भेदभाव और असुरक्षा के माहौल में होती है।
भारतीय समाज में परिवार की भूमिका काफी अहम होती है। ऐसे में जब किसी LGBTQ व्यक्ति को अपने ही घर में पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो उसका असर रिश्तों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
भारत में ट्रांसमस्कुलिन लोगों पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि परिवार में तय लैंगिक भूमिकाओं का दबाव, कपड़ों और व्यवहार को लेकर रोक-टोक, स्कूल-कॉलेज में भेदभाव और सामाजिक अपमान मानसिक परेशानी की वजह बन सकते हैं। अध्ययन में कुछ लोगों ने परिवार और समाज के बीच अपनी पहचान के अनुसार जीने के लिए संघर्ष करने की बात भी बताई।
WHO के मुताबिक, LGBTQ समुदाय के लोगों को सामाजिक भेदभाव के कारण स्वास्थ्य सेवाएं लेने में भी परेशानी हो सकती है। कुछ लोग डॉक्टर के सामने अपनी पहचान बताने से डरते हैं या पहले के खराब अनुभवों के कारण इलाज कराने से बचते हैं। इससे जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मिलने में देरी हो सकती है।
यानी किसी व्यक्ति को स्वीकार करना सिर्फ उसके निजी जीवन का मामला नहीं है। इसका संबंध इस बात से भी है कि वह बिना डर के परिवार में रह सकता है या नहीं, अपनी पढ़ाई और नौकरी जारी रख सकता है या नहीं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से खुलकर बात कर सकता है या नहीं।
कई लोगों के मन में यह सवाल भी रहता है कि अगर उनकी अपनी सोच या मान्यताएं अलग हैं, तो क्या उन्हें LGBTQ समुदाय को स्वीकार करना जरूरी है? यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी की निजी मान्यता अलग हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरे व्यक्ति का अपमान करे, उसके साथ भेदभाव करे या उसके अधिकारों को नकार दे।
किसी को सम्मान देना और उसके साथ समान व्यवहार करना जरूरी नहीं कि उसकी हर निजी पसंद से सहमत होने जैसा हो। यह समझना भी जरूरी है कि यौन रुझान और लैंगिक पहचान किसी मानसिक बीमारी का नाम नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेशेवर मनोवैज्ञानिक संस्थाएं समलैंगिकता को मानसिक विकार नहीं मानतीं।
किसी LGBTQ व्यक्ति को अपनी पहचान बदलने या छिपाने के लिए मजबूर करना समस्या का समाधान नहीं है। परिवार और दोस्तों का सहयोग, सुरक्षित माहौल और बिना भेदभाव के स्वास्थ्य सेवाएं मिलना उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अहम हैं।
कई बार किसी व्यक्ति को बेहतर महसूस कराने के लिए बहुत बड़ी कोशिश की जरूरत नहीं होती। उसकी बात बिना मजाक उड़ाए सुनना, उसकी पहचान का सम्मान करना और उसे अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी देना भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
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