
नईदुनिया प्रतिनिधि अनूपपुर। जनपद पंचायत पुष्पराजगढ़ के धरमदास और पिचरवाही गांव से लगे मैकल पर्वत क्षेत्र में जमीन धंसने और पहाड़ का बड़ा हिस्सा दरकने से ग्रामीणों में दहशत है। पिछले सप्ताह शनिवार को पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा नीचे खिसक गया था। इसके बाद से जमीन में बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई दे रही हैं और जंगल का क्षेत्र लगातार नीचे की ओर धंस रहा है।
कई पेड़ों के जड़ से उखड़कर गिरने की बात सामने आई है। पहाड़ से लगे खेतों में लगी मक्का, धान और अरहर की फसलों को नुकसान पहुंचा है। करीब आठ से 10 एकड़ क्षेत्र प्रभावित है। पहाड़ के लगभग 300 मीटर नीचे बसे आदिवासी परिवारों को अब अपने घरों और जान-माल की चिंता सताने लगी है।
एक सप्ताह बाद भी अब तक न तो प्रशासनिक निरीक्षण हुआ और न ही वन विभाग की ओर से सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं। इस संबंध में पुष्पराजगढ़ जनपद पंचायत सीईओ हरीश द्विवेदी का कहना है कि इस बारे में भूगर्भ शास्त्री ही बता सकते हैं।
पहाड़ के नीचे लगभग 300 मीटर नीचे बसे आदिवासी परिवारों को अब अपने घरों और जान-माल की चिंता सताने लगी है। ग्राम पंचायत धरमदास के ग्रामीण केवल सिंह, लल्ला राम, पूर्व सरपंच भैयालाल और जगत सिंह मार्को के मुताबिक, उनके घर जंगल और पहाड़ से बिल्कुल सटे हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन लगातार बैठ रही है और पहाड़ का हिस्सा धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसक रहा है।
धरमदास गांव से लगे पहाड़ में दिखाई दे रहे क्षतिग्रस्त पेड़। सौजन्य - सोशल मीडिया
रात के समय जंगल से अजीब आवाजें सुनाई देने और दरारें बढ़ने की बात भी ग्रामीणों ने कही है। पूर्व सरपंच भैयालाल ने चिंता जताते हुए कहा कि आदिवासी परिवारों के घर पहाड़ के नीचे बसे हैं। यदि दरकने का सिलसिला इसी तरह जारी रहा और यह प्रक्रिया बस्ती की ओर बढ़ी, तो बड़ा नुकसान हो सकता है। उन्होंने प्रशासन से तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति का आकलन करने और प्रभावित परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
धरमदास गांव के ग्रामीण केवल सिंह और लल्ला राम ने बताया कि पहाड़ की स्थिति को लेकर बच्चों में भी डर बना हुआ है। बच्चे जंगल की ओर जाने से कतरा रहे हैं, जबकि ग्रामीण रातभर जागकर पहाड़ की गतिविधियों पर नजर रखने को मजबूर हैं। पहाड़ से लगे खेतों में मक्का, धान और अरहर की फसलें प्रभावित होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है।
पिचरवाही गांव के पहाड़ी क्षेत्र से लगे खेतों में नुकसान अधिक होने की बात कही जा रही है। अपनी फसलों की स्थिति देखने के लिए किसान रोजाना मौके पर पहुंच रहे हैं। वहीं, पहाड़ दरकने की खबर फैलने के बाद बड़ी संख्या में लोग भी घटनास्थल देखने पहुंच रहे हैं।
ऐसे में दरकी हुई जमीन और लगातार बढ़ती दरारों के बीच लोगों का पहुंचना एक अलग खतरा पैदा कर रहा है। यदि प्रभावित क्षेत्र की स्थिति का सही आकलन नहीं हुआ और लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो किसी अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
घटना के कई दिन बीत जाने के बावजूद ग्रामीणों ने अब तक प्रशासनिक निरीक्षण नहीं होने और वन विभाग की ओर से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जाने की शिकायत की है। ग्रामीणों के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र में न तो घेराबंदी की गई है और न ही लोगों को खतरे से आगाह करने के लिए चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। इससे लोग बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के दरके हुए पहाड़ के नजदीक पहुंच रहे हैं।
हालांकि, पहाड़ के दरकने के वास्तविक कारण, प्रभावित क्षेत्र की सीमा और आगे जमीन खिसकने की आशंका का वैज्ञानिक आकलन अभी आवश्यक है। ऐसे में संबंधित विभागों की ओर से स्थल निरीक्षण और विशेषज्ञों की जांच के बिना खतरे की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है।
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उनकी प्रमुख मांगों में भू-वैज्ञानिक विशेषज्ञों की टीम से सर्वे कराना, दरारों और धंसाव की स्थिति का आकलन करना, संवेदनशील क्षेत्र में लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित करना तथा पहाड़ के नीचे बसे परिवारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना शामिल है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहाड़ के लगातार धंसने की शिकायतों के बीच संबंधित विभाग कब मौके पर पहुंचेंगे और प्रभावित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का आकलन कब होगा। समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो ग्रामीणों की चिंता गंभीर खतरे में बदल सकती है।
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