
नईदुनिया प्रतिनिधि, अनूपपुर। जिला मुख्यालय स्थित पुराने तहसील कार्यालय भवन के वेयरहाउस से 24 ईवीएम गायब होने के मामले की गुत्थी आखिरकार सुलझ गई है। जांच में सामने आया कि जिन 8 बैलेट यूनिट और 16 कंट्रोल यूनिट को गायब मानकर चोरी की आशंका जताई गई और कोतवाली में एफआईआर तक दर्ज करा दी गई, वे मशीनें वर्ष 2021 में ही खराब होने के कारण भोपाल भेजी जा चुकी थीं। भोपाल से इन्हें ईसीआईएल कंपनी, हैदराबाद भेजकर नष्ट भी कराया जा चुका है।
मामले में सबसे गंभीर पहलू यह सामने आया है कि वर्ष 2021 में मशीनों को भोपाल भेजे जाने के बावजूद जिला निर्वाचन कार्यालय के अधिकारियों ने इसकी ऑनलाइन एंट्री पोर्टल पर दर्ज नहीं की। इसके चलते मशीनों के वास्तविक स्टेटस का रिकॉर्ड अपडेट नहीं हो सका। समय बीतने के साथ यह जानकारी अधिकारियों के संज्ञान से भी बाहर हो गई और हालिया भौतिक सत्यापन में मशीनें कम मिलने पर उन्हें गायब समझ लिया गया।
मामले में उप जिला निर्वाचन अधिकारी एवं अपर कलेक्टर बलवीर रमन के अनुसार, उक्त ईवीएम वर्ष 2014 से तहसील परिसर के पीछे एक अस्थायी कक्ष बनाकर सुरक्षित रखी गई थीं और इनमें खराबी थी। वर्ष 2020 में राज्य स्तर से खराब मशीनों की जानकारी मांगी गई थी।
इसके बाद तत्कालीन उप जिला निर्वाचन अधिकारी सरोधन सिंह के आदेश पर 11 अक्टूबर 2021 को संबंधित 24 मशीनों को भोपाल भिजवाया था। भोपाल से इन्हें ईसीआईएल, हैदराबाद भेजा गया, जहां बाद में इन्हें नष्ट कर दिया गया।
हालांकि, मशीनों के भोपाल भेजे जाने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी इसका ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट नहीं किया गया। यही चूक पांच वर्ष बाद पूरे घटनाक्रम की वजह बन गई। अब इस पूरे मामले की जद के दोषियों में अनूपपुर निर्वाचन शाखा के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी हैं।
इनके चलते निर्वाचन जैसे कार्य में उपयोग में लाई जाने वाली ईवीएम का लेखा-जोखा स्पष्ट रूप से न रखा जाना भारी लापरवाही दर्शाता है। इस मामले में यह भी उजागर हो गया कि किस तरह से पुराने तहसील भवन में असुरक्षित रूप से बिना देख-रेख के ईवीएम मशीन रखी हुई थी। जबकि 1 साल पहले ही तहसील कार्यालय पॉलिटेक्निक भवन में स्थानांतरित हो चुका था और कार्यालय के सभी सामान भी, फिर भी निर्वाचन सामग्री लावारिस छोड़ दी गई।
हाल ही में पुराने तहसील भवन के डिस्मेंटल कार्य के दौरान वेयरहाउस प्रभावित हुआ है। 21 सितंबर को ईवीएम को शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में शिफ्ट किए जाने के बाद 24 से 28 सितंबर के बीच भौतिक सत्यापन कराया गया। सत्यापन में 24 मशीनें कम मिलीं। वेयरहाउस के कमरे की पिछली दीवार भी टूटी हुई मिली, जिसके बाद अधिकारियों ने मशीनों के चोरी होने की आशंका जताई।
मामले में फाइल और पुराने अभिलेखों की पूरी जांच किए बिना ही पुलिस में शिकायत पहुंची और बुधवार रात अनूपपुर कोतवाली में अज्ञात चोरों के खिलाफ बीएनएस की धारा 331(4) और 305(ए) के तहत एफआईआर दर्ज करा दी गई।
ईवीएम गायब होने के बाद शुरू हुई विभागीय जांच में जब पुराने निर्वाचन अभिलेख खंगाले गए, तो वर्ष 2021 का वह पत्र सामने आया, जिसके आधार पर संबंधित मशीनों को भोपाल भेजा गया था। इसके बाद भोपाल निर्वाचन कार्यालय से संपर्क किया गया। वहां से पुष्टि हुई कि अनूपपुर से भेजी गई खराब ईवीएम को ईसीआईएल, हैदराबाद भेजा गया था और उनका निस्तारण पहले ही किया जा चुका है।
इस दस्तावेज के सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि ईवीएम चोरी नहीं हुई थीं, बल्कि उनके रिकॉर्ड को समय पर अपडेट नहीं किए जाने के कारण वे कागजों में उपलब्ध और भौतिक रूप से अनुपस्थित दिखाई दे रही थीं।
मामला भले ही चोरी का नहीं निकला हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने जिला निर्वाचन शाखा की रिकॉर्ड संधारण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांच वर्ष पहले भेजी जा चुकी मशीनों की जानकारी ऑनलाइन रिकॉर्ड में दर्ज न होना, संबंधित फाइल का समय पर परीक्षण न होना और भौतिक सत्यापन के दौरान पुराने अभिलेखों की जांच किए बिना चोरी की आशंका में पुलिस कार्रवाई तक पहुंच जाना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
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बताया गया कि निर्वाचन शाखा जो कलेक्ट्रेट में संचालित है और जो तहसील में ईवीएम प्रभारी हैं, वे पिछले 5 वर्ष पहले से इस कार्यालय में अन्य विभागों के कर्मचारी होने के बावजूद संलग्न हैं, जो पंचायत, विधानसभा, लोकसभा चुनाव का पूरा काम देख रहे हैं। फिर भी जब यह मामला आया तो इन कर्मचारियों की लापरवाही उजागर हुई, जिन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को पूरे मामले की जानकारी से अवगत नहीं कराया।
ईवीएम जैसी संवेदनशील निर्वाचन सामग्री के मामले में मशीनों के आवागमन, निस्तारण और भौतिक सत्यापन का रिकॉर्ड अद्यतन रहना जरूरी है। यदि वर्ष 2021 में ही ऑनलाइन रिकॉर्ड दुरुस्त कर दिया जाता तो पांच वर्ष बाद 24 ईवीएम के गायब होने की स्थिति ही पैदा नहीं होती और न ही पुलिस को चोरी की एफआईआर दर्ज करने की नौबत आती।
अब पूरे मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि रिकॉर्ड अपडेट नहीं करने और बिना पूरी अभिलेखीय जांच के चोरी की एफआईआर तक मामला पहुंचाने की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाती है। प्रशासनिक जांच में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि यह केवल भूल-चूक थी या निर्वाचन रिकॉर्ड के प्रति गंभीर लापरवाही।