
नईदुनिया प्रतिनिधि, बड़वानी। बिहार के दशरथ माझी ने अकेले पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। बड़वानी जिले के पाटी विकासखंड के खोड़ी पलास फलिया में अब घर-घर से दशरथ माझी निकल आए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां एक व्यक्ति नहीं, पूरा गांव पहाड़ का सीना चीरकर अपना रास्ता बना रहा है। वजह भी वही है, जो दशरथ माझी की थी व्यवस्था की बेरुखी और वर्षों की उपेक्षा। ग्राम पंचायत उबादगढ़ के इस आदिवासी फलिया में करीब 250 लोग और 40 परिवार रहते हैं।
यहां तक पहुंचने के लिए अभी तक सड़क नहीं बन सकी थी। ग्रामीण वर्षों से पंचायत, जनपद पंचायत, जिला प्रशासन के कार्यालयों के साथ ही जनसुनवाई में सड़क निर्माण की मांग करते रहे। आवेदन दिए, अधिकारियों से मिले और जनप्रतिनिधियों को अपनी परेशानी बताई, लेकिन हर बार आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। चुनाव के समय सड़क बनाने के वादे जरूर किए गए, मगर चुनाव खत्म होते ही वे भी खत्म हो गए।
आखिरकार ग्रामीणों ने इंतजार छोड़ दिया। गांव में बैठक हुई और तय किया गया कि अब सड़क के लिए किसी योजना या मंजूरी का इंतजार नहीं किया जाएगा। प्रत्येक परिवार ने अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक योगदान दिया। अधिकांश घरों से 10-10 हजार रुपये तक एकत्र किए गए। इस राशि से जेसीबी मशीन किराए पर ली गई और सड़क निर्माण का काम शुरू कर दिया गया।
ग्रामीणों ने निर्माण कार्य के लिए दो अलग-अलग टीमें बनाई हैं। प्रतिदिन 35 से 40 लोग श्रमदान कर रहे हैं। कोई पत्थर हटाने में जुटा, कोई मिट्टी समतल करता रहा तो कोई मशीनों के साथ मिलकर पहाड़ी क्षेत्र में रास्ता तैयार करने लगा। परिणाम यह कि पिछले एक सप्ताह में करीब आधा किलोमीटर कच्ची सड़क तैयार हो चुकी है। ग्रामीणों का लक्ष्य बारिश शुरू होने से पहले शेष डेढ़ किलोमीटर मार्ग भी पूरा करने का है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने का सबसे बड़ा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता था। उनको रोज उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों से होकर स्कूल जाना पड़ता था। बरसात में कई बार बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते थे। किताबें और कपड़े भीग जाते थे और पढ़ाई प्रभावित होती थी। स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती था।
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बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अस्पताल तक ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं था। कई बार वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते थे और मरीजों को चारपाई या झोली में उठाकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता था। समय पर उपचार नहीं मिलने का खतरा हमेशा बना रहता था। बरसात के दिनों में गांव का संपर्क लगभग टूट जाता था। राशन, खेती-किसानी और रोजगार जैसे सामान्य काम भी मुश्किल हो जाते थे।