
शिवम पाण्डेय, नईदुनिया भिंड। चंबल नदी अब अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, बीहड़ों और शांत बहाव के साथ दुर्लभ जलीय जीवों एवं पक्षियों के दीदार के लिए भी पर्यटकों को आकर्षित करने की तैयारी में है। वन विभाग चंबल नदी के किनारे विशेष ट्रैक विकसित करने की योजना बना रहा है।
इन ट्रैक के जरिए पर्यटक चंबल के प्राकृतिक वातावरण में डाल्फिन, घड़ियाल, कछुओं और दुर्लभ पक्षियों को करीब से देख सकेंगे। साथ ही पर्यटकों को इन जीवों के प्राकृतिक आवास, जीवनशैली और संरक्षण के बारे में भी जानकारी दी जाएगी।
चंबल नदी देश की उन प्रमुख नदियों में शामिल है, जहां कई दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर पहुंची जलीय जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें गंगा डाल्फिन, घड़ियाल और विभिन्न प्रजातियों के कछुए प्रमुख हैं। चंबल का क्षेत्र दुर्लभ पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास माना जाता है।
नदी किनारे करीब 173 प्रजातियों के पक्षी देखे जाते हैं। इनमें इंडियन स्कीमर और ब्लैक-बेलीड टर्न जैसी दुर्लभ प्रजातियां भी शामिल हैं। वन विभाग की योजना के तहत केवल ट्रैक तैयार करने तक ही व्यवस्था सीमित नहीं रहेगी। पर्यटकों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चंबल किनारे आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
यहां खान-पान, बैठने, सुरक्षा और वन्यजीवों को देखने के लिए निर्धारित स्थान विकसित किए जाने की योजना है। पर्यटकों को चंबल के वन्यजीवों के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय स्तर पर लोगों को प्रशिक्षण देकर गाइड के रूप में जोड़े जाने की भी योजना है।
गाइड पर्यटकों को डाल्फिन, घड़ियाल, कछुओं और पक्षियों के बारे में जानकारी देने के साथ यह भी बताएंगे कि चंबल का पारिस्थितिकी तंत्र इन प्रजातियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है। इससे पर्यटकों को मनोरंजन के साथ वन्यजीव संरक्षण का संदेश भी मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है।
चंबल में वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों के चलते कई प्रजातियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 में चंबल में डाल्फिन की संख्या महज 74 थी। इसके बाद इनकी संख्या बढ़कर 155 तक पहुंची, जबकि वर्ष 2025 में डाल्फिन की संख्या 111 दर्ज की गई थी।
वहीं इस बार घड़ियालों की संख्या 476 की वृद्धि के साथ 2,938 तक पहुंच गई है। इसी तरह दुर्लभ इंडियन स्कीमर की संख्या भी 266 बढ़कर 1,055 तक पहुंच गई है। वन्यजीवों की बढ़ती संख्या चंबल के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यही वजह है कि अब संरक्षण के साथ-साथ चंबल क्षेत्र को प्रकृति आधारित पर्यटन के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
चंबल नदी में पाए जाने वाले जलीय जीवों के संरक्षण के लिए वर्ष 1979 में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की स्थापना की गई थी। अभयारण्य का उद्देश्य चंबल नदी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और इसमें पाई जाने वाली दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण करना है।
समय के साथ यह क्षेत्र घड़ियाल, गंगा डाल्फिन, कछुओं और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास के रूप में पहचान बना चुका है।
जिला मुख्याल से करीब 20 किलोमीटर दूर बरही क्षेत्र भी डाल्फिन संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। नमामि गंगे परियोजना के तहत यहां प्रदेश का पहला मांसाहारी जीव संरक्षण केंद्र भी संचालित है। बरही क्षेत्र में गंगा डाल्फिन की मौजूदगी दर्ज की गई है।
चंबल में गंगा डॉल्फिन का प्राकृतिक आवास होने के कारण यह क्षेत्र वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। डाल्फिन को वर्ष 1972 में भारतीय वन्यजीव संरक्षण कानून के दायरे में लाया गया था। इसका शिकार करना अपराध है।
चंबल में डाल्फिन की मौजूदगी नदी के स्वच्छ और अनुकूल जलीय पर्यावरण का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है। यही कारण है कि डाल्फिन सहित अन्य जलीय जीवों के संरक्षण के साथ नदी को प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों से बचाना भी जरूरी है। चंबल किनारे ट्रैक विकसित होने के बाद पर्यटकों को बीहड़ों और नदी के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ दुर्लभ वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का अवसर मिलेगा।
-डॉ. मनोज जैन, वन्य जीव विशेषज्ञ।
चंबल नदी किनारे ट्रैक विकसित किए जाने को लेकर कार्ययाेजना तैयार की जा रही है। वहीं, चंबल नदी व किनारे पर जो जलीय जीव हैं उनके बारे में लोग जान सकें इसको लेकर भी रूपरेखा बनाई जा रही है।
-लवित भारती, मुख्य वन रक्षक, वन विभाग।
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