
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। एम्स भोपाल की जन औषधि और अमृत फार्मेसी में दवाओं की भारी किल्लत है। ओपीडी में आने वाले 10 में से सात मरीजों को पर्ची की दवा बाहर के मेडिकल स्टोर से लेनी पड़ रही है। नवदुनिया की पड़ताल में एंटीबायोटिक, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कैंसर की जरूरी दवाएं स्टॉक में नहीं मिलीं।
कैंसर मरीजों के लिए ट्रैस्टुजुमैब जैसे महंगे इंजेक्शन तक उपलब्ध नहीं हैं। आयुष्मान भारत योजना के मरीजों को भी बाहर से दवा लाने को कहा जा रहा है, जबकि योजना के तहत दवा निश्शुल्क मिलनी चाहिए। इससे गरीब मरीजों पर हर महीने दो से पांच हजार रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
बैरसिया से आई कैंसर मरीज की बेटी सुनीता साहू ने बताया कि मां के लिए डाक्टर ने ट्रैस्टुजुमैब इंजेक्शन लिखा, फार्मेसी पर गए तो बोले स्टॉक में नहीं है। बाहर 45 हजार रुपये का मिल रहा है। आयुष्मान कार्ड होने के बाद भी भटकना पड़ रहा है। सीहोर से बीपी के इलाज के लिए आए रामस्वरूप यादव बोले कि तीन दवाएं लिखीं, फार्मेसी पर एक भी नहीं मिली।
फार्मासिस्ट ने कहा दो महीने से सप्लाई नहीं आई। बाहर से 800 रुपये की लेनी पड़ी। कोलार की रहने वाली डायबिटीज मरीज रेहाना बी ने कहा कि हर बार यही होता है। अंदर दवा नहीं है तो जन औषधि का क्या फायदा। अमृत फार्मेसी स्टाफ का कहना है कि सप्लाई दो महीने से नहीं आई है। एक हफ्ते में स्टाक सामान्य हो जाएगा।
इस कारण एम्स भोपाल के बाहर निजी मेडिकल संचालकों में मरीजों की भीड़ रहती है। जो दवाएं अमृत या जन औषधि केंद्रों पर नहीं मिलती है, उन दवाओं का रेट बढ़ाकर निजी मेडिकल में दिया जाता है। इससे मरीजों का आर्थिक बोझ बढ़ता है। वैसे तो कई मेडिकल संचालक 10 से 20 प्रतिशत तक छूट देने का वादा करते हैं लेकिन इसके बावजूद रेट काफी ज्यादा रहता है।
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अमृत फार्मेसी और प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र एम्स भोपाल की नहीं है। यह केंद्र सरकार की योजना के तहत एम्स परिसर में संचालित होती है, लेकिन इसका संचालन केंद्र द्वारा ही होता है। एम्स भोपाल प्रबंधन का इसमें कोई रोल नहीं होता। - डॉ. विकास गुप्ता, अधीक्षक, एम्स भोपाल