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नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। राजधानी भोपाल जल्द ही देश के उन चुनिंदा हाईटेक शहरों की सूची में शामिल होने जा रहा है, जहां शव का पोस्टमार्टम करने के लिए डाक्टरों को कैंची और नश्तर (सर्जिकल चाकू) का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। एम्स भोपाल में वर्चुअल आटोप्सी शुरू होगी।
एम्स प्रबंधन ने भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (एसएफसी) की बैठक में इस परियोजना का औपचारिक प्रस्ताव रखा। भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से इसे पहले ही सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी थी, अब वित्त मंत्रालय से फंड जारी होते ही एम्स भोपाल यह सुविधा देने वाला मध्य प्रदेश का पहला अस्पताल बन जाएगा।
वर्चुअल आटोप्सी जापान और पश्चिमी देशों में अपनाई जाने वाली एक आधुनिक तकनीक है। इसमें शव की चीरफाड़ किए बिना सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी मशीनों के जरिए शरीर के आंतरिक अंगों की जांच की जाती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और नान-इनवेसिव होती है। भारत में सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में इसकी शुरुआत हुई थी।
अब सरकार का लक्ष्य 2026 की शुरुआत तक देशभर में 38 वर्चुअल आटोप्सी लैब स्थापित करने का है, जिसमें एम्स भोपाल एक प्रमुख केंद्र होगा।थ्रीडी तस्वीरों में कैद होंगे मौत के सबूत विशेषज्ञों के अनुसार, वर्चुअल आटोप्सी की रिपोर्ट कोर्ट में डिजिटल साक्ष्य के रूप में बेहद अहम साबित होगी। उदाहरण के लिए यदि मौत हार्ट ब्लाकेज या नस फटने से हुई है, तो मशीन उसकी थ्रीडी तस्वीर तैयार करेगी। यह तस्वीर तीन लेयर में होगी जिसमें पूरे शरीर की स्थिति, संबंधित अंग और उस नस की क्लोज-अप इमेज बनेगी।
ये डिजिटल सबूत सालों तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं, जिन्हें पारंपरिक पोस्टमार्टम में सहेजना मुश्किल होता था। शिलान्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस के अध्ययन में पाया गया है कि वर्चुअल और पारंपरिक आटोप्सी के नतीजों में 90% तक समानता होती है।परिजनों को मिलेगी भावनात्मक राहत अक्सर देखा गया है कि धार्मिक मान्यताओं या भावनात्मक लगाव के कारण परिजन शव की चीरफाड़ नहीं कराना चाहते।
कई बार अस्पतालों में इसे लेकर विवाद भी होते हैं। वर्चुअल आटोप्सी से शव को कोई बाहरी नुकसान नहीं पहुंचता, जिससे परिजनों को शव सही अवस्था में सौंपा जा सकेगा और उनकी भावनाएं आहत नहीं होंगी।आधे घंटे में पूरी होगी प्रक्रिया पारंपरिक पोस्टमार्टम में जहां कई घंटे लग जाते हैं, वहीं वर्चुअल आटोप्सी में पूरी प्रक्रिया मात्र 30 मिनट में पूरी हो सकती है।
यह तकनीक सड़क हादसों और हत्या के मामलों में त्वरित जांच के लिए वरदान साबित होगी। साथ ही कोविड या अन्य संक्रामक बीमारियों से हुई मौत के मामलों में डाक्टरों और स्टाफ को संक्रमण के खतरे से भी बचाएगी।