भोपाल समेत MP के 8 शहरों में हवा 'जहरीली', NGT ने सरकार को जारी किया नोटिस
एनजीटी ने भोपाल समेत मध्य प्रदेश के आठ शहरों में गंभीर वायु प्रदूषण पर चिंता जताई है। स्वच्छ हवा को मौलिक अधिकार बताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा ग ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 08 Jan 2026 09:26:38 AM (IST)Updated Date: Thu, 08 Jan 2026 09:26:38 AM (IST)
मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने व्यक्त की चिंता। (फाइल फोटो)HighLights
- भोपाल सहित आठ शहर लगातार नान-अटेनमेंट श्रेणी में बने
- स्वच्छ हवा नागरिकों का मौलिक अधिकार, उल्लंघन पर एनजीटी सख्त
- वायु गुणवत्ता आंकड़ों में हेरफेर का आरोप, डेटा भ्रामक बताया
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। भोपाल सहित मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण और धुंध की चादर को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने चिंता व्यक्त की है। पर्यावरणविद् और आवेदक राशिद नूर खान की याचिका पर बुधवार को सुनवाई करते हुए एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है।
एनजीटी ने कहा कि स्वच्छ हवा में सांस लेना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, जिसका राज्य में इसका लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। एनजीटी ने पाया कि प्रदेश के आठ शहर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, सागर, उज्जैन, देवास और सिंगरौली 'नान-अटेनमेंट' श्रेणी में बने हुए हैं। यानी ये शहर पिछले पांच वर्षों से लगातार राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) को पूरा करने में विफल रहे हैं।
एनजीटी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली-एनसीआर के लिए अपनाए गए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) और एयर-शेड आधारित नीति के बावजूद मध्य प्रदेश में अब तक ऐसा कोई प्रभावी राज्य स्तरीय तंत्र लागू नहीं किया है, जिससे वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है।
डाटा में 'हेरफेर' करने का आरोप
- एनजीटी ने आदेश में यह भी कहा कि भोपाल को झीलों की नगरी कहा जाता है, लेकिन यह सर्दियों में लगातार धुंध, कम दृश्यता और 'बहुत खराब' से 'गंभीर' श्रेणी के एक्यूआइ का सामना कर रहा है। इस दौरान शहर का एक्यूआइ 300 से 330 तक पहुंच रहा है। भोपाल में पीएम 10 का स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है, जो सुरक्षित सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से तीन गुना अधिक है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि अधिकारी प्रदूषण के आंकड़ों को कम दिखाने के लिए एयर मॉनीटरिंग स्टेशनों के पास दिन में 10 से 15 बार पानी का छिड़काव करते हैं, ताकि डाटा सामान्य दिखे। ऐसे में एनजीटी ने इन आंकड़ों को 'भ्रामक और सेहत के लिए खतरनाक' बताया। प्रदूषण के प्रमुख कारण
- मध्य प्रदेश अब पराली जलाने के मामले में पंजाब-हरियाणा को पीछे छोड़ चुका है। अकेले सीहोर, रायसेन और विदिशा जैसे जिलों में 31 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए हैं।
- स्मार्ट सिटी और मेट्रो प्रोजेक्ट्स के नाम पर हो रहे निर्माण कार्यों में धूल को नियंत्रित करने के लिए 'स्प्रिंकलर' या 'व्हील वाशिंग' जैसे अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया जा रहा।
- शहर में बिना पीयूसी सर्टिफिकेट के दौड़ रहे डीजल आटो और 15 साल पुराने वाहन हवा में जहर घोल रहे हैं।
- खुले में कचरा जलाने, लैंडफिल आग, पटाखों के उपयोग और औद्योगिक गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव से प्रदूषण बढ़ रहा है।
उच्च स्तरीय कमेटी गठित कर मांगी रिपोर्ट
- एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार एवं संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। साथ ही एक उच्च स्तरीय ज्वाइंट कमेटी का गठन किया है। इसमें पर्यावरण विभाग, नगरीय प्रशासन विभाग, परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव, इप्को के प्रतिनिधि, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य, सीपीसीबी के पूर्व अतिरिक्त निदेशक डा. रविप्रकाश मिश्रा शामिल किए गए हैं।
- समिति को छह सप्ताह के भीतर स्थिति का आकलन कर एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) प्रस्तुत करने को कहा गया है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल को नोडल एजेंसी नियुक्त किया है। मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को होगी। साथ ही मुख्य सचिव से लेकर नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया है।