
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। भारतीय मंदिर और मूर्तिकला परंपरा में देवी-देवताओं के अनेक रूपों का अंकन मिलता है, लेकिन एक ही प्रस्तर स्तंभ पर शिव और विष्णु के विभिन्न स्वरूपों को इतनी कलात्मकता से उकेरा जाना इसे विशेष बनाता है।
देवबड़ला से जुड़ी इस एकाश्म (एक ही पत्थर से बनी) शिल्पकृति में स्तंभ के ऊपरी हिस्से में सदाशिव के पांच स्वरूपों का निरूपण है, जबकि नीचे चारों दिशाओं में बने अलंकृत ताकों में विष्णु के चार रूप विराजमान हैं।
इस प्रस्तर स्तंभ का ऊपरी हिस्सा सदाशिव के रूप में बनाया गया है। इसमें चार दिशाओं की ओर से दिखाई देने वाले चार मुख हैं, जबकि पांचवां स्वरूप शीर्ष पर प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया गया है। चार मुखों की पहचान क्रमश: पूर्व में तत्पुरुष, उत्तर में वामदेव, दक्षिण में अघोर और पश्चिम में सद्योजात के रूप में की गई है। शीर्ष पर पांचवां स्वरूप ईशान है।
पांचों स्वरूपों को अलग-अलग भाव-भंगिमा और पारंपरिक आभूषणों के साथ उकेरा गया है। जटामुकुट, कुंडल और अन्य अलंकरण इन मुखों की शिल्पगत विशेषता को और उभारते हैं। शिल्पशास्त्रीय परंपरा में सदाशिव के ये पांच स्वरूप भगवान शिव के व्यापक और सर्वव्यापी स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं।
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के पुराविद डा. रमेश यादव कहते हैं कि यह मूर्ति शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय का दुर्लभ उदाहरण है। सीहोर के देवबड़ला संग्रहालय में रखी यह मूर्ति लगभग 1100 वर्ष पहले यानी परमार काल की है।
स्तंभ के प्रत्येक ताक में देवी-देवताओं, परिचारकों, भक्तों और सजावटी अलंकरणों का बारीक अंकन है। यह शिल्प केवल मूर्तियों का समूह नहीं, बल्कि शैव और वैष्णव परंपराओं को एक ही संरचना में समाहित करने वाली शिल्प परंपरा का उदाहरण है।
पूर्वी ताक में नारायण की प्रतिमा है। वे समभंग मुद्रा में खड़े हैं और किरीट-मुकुट, हार, बाजूबंद, कुंडल सहित पारंपरिक आभूषणों से अलंकृत हैं। एक अन्य ताक में दामोदर का रूप है। तीसरी प्रतिमा वामन के रूप में पहचानी गई है और चौथी उपेंद्र की है। पद्म पुराण के पातालखंड में विष्णु के 24 रूपों, जिन्हें चतुर्विंशति मूर्ति या व्यूह मूर्ति कहा जाता है, का उल्लेख मिलता है।
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इन सभी रूपों की मूल आकृति काफी समान होती है, खड़ी हुई चतुर्भुज प्रतिमा, किरीट-मुकुट और पारंपरिक आभूषण। इनके बीच मुख्य अंतर चार आयुधों शंख, चक्र, गदा और पद्म को चारों हाथों में रखने के क्रम से निर्धारित होता है।
देवबड़ला में लगभग 400 वर्ष पहले मंदिर समूहों के गिरने से मूर्तियां दब गई थीं। वर्ष 2016 के बाद खोदाई कर उन्हें निकाला और संरक्षित किया गया। अब उनके संबंध में धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर बारीकियां पता की जा रही हैं। इससे पता चल रहा है कि मूर्तियां बहुत अनूठी हैं। - मदन कुमार नागरगोजे, आयुक्त, पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार