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भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स; 3 करोड़ का रोजाना कारोबार, पर नियम हवा-हवाई

राजधानी भोपाल में एंटीबायोटिक्स की ''ओवर द काउंटर'' (ओटीसी) बिक्री एक साइलेंट किलर की तरह पैर पसार रही है। ''नवदुनिया'' की पड़ताल में चौंकाने वाला सच ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akash Pandey
Publish Date: Fri, 06 Feb 2026 12:22:38 PM (IST)Updated Date: Fri, 06 Feb 2026 01:19:31 PM (IST)
भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स; 3 करोड़ का रोजाना कारोबार, पर नियम हवा-हवाई
भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स

नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। राजधानी भोपाल में एंटीबायोटिक्स की ''ओवर द काउंटर'' (ओटीसी) बिक्री एक साइलेंट किलर की तरह पैर पसार रही है। ''नवदुनिया'' की पड़ताल में चौंकाने वाला सच सामने आया है कि शहर के अधिकांश मेडिकल स्टोर पर बिना किसी डाक्टर के पर्चे के शेड्यूल-एच और एच-वन श्रेणी की एंटीबायोटिक्स धड़ल्ले से बेची जा रही हैं। दवा कारोबारियों के मुताबिक, भोपाल जिले में ही प्रतिदिन करीब तीन करोड़ रुपये की एंटीबायोटिक्स की बिक्री होती है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा बिना पर्चे के खरीदा जाता है।

शहर के तीन प्रमुख इलाकों में टीम का रियलिटी चेक

एमपी नगर जोन-एक : चेतक ब्रिज के समीप एक मेडिकल स्टोर पर रिपोर्टर दवा खरीदने पहुंचा। वे विक्रेता से ''एजीथ्रोमाइसिन'' की मांग करता है। इस पर दवा विक्रेता केवल यह पूछता है कि 300 एमजी चाहिए या 500 एमजी। रिपोर्टर के 500 एमजी कहने पर विक्रेता बिना किसी डाक्टर की पर्ची या विशेषज्ञ की सलाह के दवा उपलब्ध करा देता है।


अयोध्या नगर : साईं नाथ मेडिकल स्टोर पर जब मरीज ने ''अमोक्सीसिलिन'' मांगी, तो दुकानदार ने बिना कोई सवाल किए स्ट्रिप थमा दी। पर्चे के बारे में पूछने पर उसने कहा कि पर्चा है तो दिखा दो। नहीं तो उसका एमजी बता दो। बच्चे को देनी है बड़ों को यह बता दो। दवा मैं दे दूंगा।

रचना नगर : रेलवे लाइन के समीप एक दवा दुकान पर रिपोर्टर दवा खरीदने पहुंचते हैं। वे दवा विक्रेता से एजीथ्रोमाइसिन की मांग करते हैं। इस दौरान दवा विक्रेता न तो कोई सवाल पूछता है और न ही किसी प्रकार का डाक्टर का पर्चा देखने की जरूरत समझता है। बिना मरीज की जानकारी लिए वह सीधे एजीथ्रोमाइसिन की एक टैबलेट निकालकर दे देता है।

गौतम नगर : दोपहर करीब तीन बजे अंजू मेडिकल स्टोर जाकर रिपोर्टर ने इंफेक्शन ठीक करने के लिए एजिथ्रोमाइसिन एंटी बायोटिक मांगी। मेडिकल पर मौजूद स्टाफ ने पूछा कि टेबलेट कितने एमजी की चाहिए। हमारे बताने पर 500 एमजी की छह टेबलेट की स्ट्रिप थमा दी और बताया कि यह टेबलेट सुबह-शाम तीन दिन तक लेनी है। इन टेबलेट्स के लिए उसने 70 रुपये लिए।

आमने-सामने : केमिस्ट और मरीजों की दलील

मरीज (सुनील वर्मा, न्यू मार्केट) ने बताया कि डाक्टर की फीस 500 रुपये है, जबकि दवा 50 रुपये में मिल जाती है। छोटी-मोटी सर्दी के लिए डाक्टर के पास कौन जाए? इसलिए मैं बाहर से ही दवा ले लेता हूं।

केमिस्ट परवेश सिंह ने बताया कि अगर हम मना करेंगे, तो ग्राहक बगल वाली दुकान पर चला जाएगा। बिजनेस का सवाल है, नियम तो कागजों पर हैं।

इनका कहना है

जितेंद्र धाकड़, अध्यक्ष, भोपाल केमिस्ट एसोसिएशन काल कहना है किहमने सभी 4000 केमिस्टों को सर्कुलर जारी किया है कि बिना पर्चे के दवा न बेचें। लेकिन कभी-कभी व्यावहारिक दिक्कतों के कारण ऐसा होता है। प्रशासन को केवल केमिस्टों को नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर भी लगाम कसनी चाहिए जो जरूरत से ज्यादा सप्लाई कर रही हैं। कई बार मरीज अपना पर्चा नहीं ला पाता है ऐसे में केमिस्ट को बिना पर्चे के ही दवाई देनी पड़ती है। लेकिन मरीज से उसकी बीमारी और डोज जरूर पूछा जाता है।

क्या बोले सिविल सर्जन

डॉ. संजय जैन, सिविल सर्जन, भोपाल का कहना है कि बिना डाक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स लेना शरीर में सुपरबग पैदा कर रहा है। आज स्थिति यह है कि निमोनिया और यूटीआइ जैसी सामान्य बीमारियों में भी हैवी एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रही हैं। यह भविष्य के लिए एक मेडिकल इमरजेंसी है। कोई भी दवाई को बिना डाक्टरी पर्चे से नहीं लें।

नियमों की धज्जियां : शेड्यूल एच-वन की अनदेखी

ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट के तहत एंटीबायोटिक्स शेड्यूल एच-वन में आती हैं। नियम कहता है कि केमिस्ट को हर बिक्री का रिकार्ड रजिस्टर में रखना होगा। पर्चे की एक कापी दुकान पर रखनी अनिवार्य है। दवा की स्ट्रिप पर लाल रंग की पट्टी होनी चाहिए। परंतु भोपाल के जमीनी हालात इन नियमों से कोसों दूर हैं।

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