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भोपाल में फसलों और पशुओं पर एंटीबायोटिक्स का छिड़काव, इंसानों में 'रेजिस्टेंस' का बढ़ा खतरा

MP News: भोपाल के बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया और निजी तालाबों में हो रहे मत्स्य पालन में भी संक्रमण रोकने के नाम पर पानी में दवाओं का छिड़काव किया जा रह...और पढ़ें

By mukesh vishwakarmaEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sat, 07 Feb 2026 10:02:07 PM (IST)Updated Date: Sat, 07 Feb 2026 10:02:06 PM (IST)
भोपाल में फसलों और पशुओं पर एंटीबायोटिक्स का छिड़काव, इंसानों में 'रेजिस्टेंस' का बढ़ा खतरा
भोपाल में फसलों और पशुओं पर एंटीबायोटिक्स का छिड़काव

मुकेश विश्वकर्मा, नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। जिसे आप पोषण समझकर अपनी थाली में सजा रहे हैं, वह दरअसल ''धीमा जहर'' है। राजधानी भोपाल के ग्रामीण इलाकों में मुनाफे की हवस ने हमारी पूरी खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) को खतरे में डाल दिया है। फंदा और बैरसिया ब्लॉक के खेतों, डेयरियों और पोल्ट्री फार्मों में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल दवाओं की तरह नहीं, बल्कि खाद और कीटनाशकों की तरह किया जा रहा है।

डराने वाली बात यह है कि जिन जीवन रक्षक दवाओं को इंसानों के लिए अंतिम हथियार माना जाता है, उन्हें किसान और पशुपालक धड़ल्ले से मुर्गियों को बड़ा करने और सब्जियों को चमकाने में झोंक रहे हैं।

खेतों में कीटनाशक कम, एंटीबायोटिक्स ज्यादा

पड़ताल के दौरान बैरसिया रोड स्थित गांवों में देखा गया कि किसान टमाटर, मिर्च और अन्य सब्जियों को बैक्टीरिया से बचाने के लिए ''स्ट्रेप्टोमाइसिन'' और ''टेट्रासाइक्लिन'' जैसी दवाओं के घोल का छिड़काव कर रहे हैं। किसानों का मानना है कि इससे फसल ''चमकदार'' और ''स्वस्थ'' रहती है। इसका नतीजा यह है कि मिट्टी में मौजूद मित्र बैक्टीरिया मर रहे हैं और सब्जियां इन दवाओं के अवशेषों को सोख रही हैं, जो सीधे हमारी थाली तक पहुंच रहे हैं।


डेयरी और पोल्ट्री में मुनाफे के लिए दवाओं का ''डोज'' जिले के बाहरी इलाकों में संचालित पोल्ट्री फार्मों में मुर्गियों को जल्दी बड़ा करने और उन्हें संक्रामक रोगों से बचाने के लिए दाने और पानी में एंटीबायोटिक्स मिलाए जा रहे हैं।

मुर्गियों को ''कोलिस्टिन'' जैसी ''लास्ट रिसार्ट'' एंटीबायोटिक दी जा रही है, जिसे डब्लूएचओ ने इंसानों के लिए बेहद आरक्षित रखा है। वहीं दूध का उत्पादन बढ़ाने और थनैला रोग से बचाव के नाम पर गाय-भैंसों को हैवी डोज दिए जा रहे हैं। बिना डाक्टर की सलाह के डेयरी संचालक खुद ही इंजेक्शन लगा रहे हैं।

तालाबों में घुलता एंटीमाइक्रोबियल जहर

भोपाल के बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया और निजी तालाबों में हो रहे मत्स्य पालन में भी संक्रमण रोकने के नाम पर पानी में दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, पानी में घुली ये दवाएं जलीय ईकोसिस्टम को बर्बाद कर रही हैं और मछलियों के जरिए मानव शरीर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पैदा कर रही हैं।

बैन के बाद भी ''आक्सीटोसिन'' का खेल, दूध नहीं, जहर निकाल रहे डेयरी संचालक

पड़ताल के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जिले की कई डेयरियों में गाय और भैंसों से ज्यादा दूध निकालने के लिए ''आक्सीटोसिन'' के इंजेक्शन का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। केंद्र सरकार ने पशुओं पर इसके क्रूर इस्तेमाल और इंसानी सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के कारण इसे पूरी तरह बैन (प्रतिबंधित) कर रखा है। डाक्टर भी इसके इस्तेमाल को पशुओं के लिए जानलेवा और दूध पीने वालों के लिए हानिकारक बताते हैं। चूंकि यह खुले बाजार में उपलब्ध नहीं है, इसलिए डेयरी संचालक इसे चोरी-छिपे बाहरी स्रोतों से मंगवाते हैं।

यह इंजेक्शन पशुओं के गर्भाशय और स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है, लेकिन चंद रुपयों के मुनाफे के लिए बेजुबानों की जान दांव पर लगाई जा रही है। आक्सीटोसिन युक्त दूध का सेवन करने वाले बच्चों और वयस्कों में हार्मोनल असंतुलन, समय से पहले शारीरिक विकास और आंखों की कमजोरी जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कचरे के ढेर से बीमारी चर रहे लावारिस पशु, शहरवासियों की सेहत में घुल रहा संक्रमण भोपाल के शहरी और अर्द्ध-शहरी इलाकों में ''दूध का कारोबार'' अब बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है।

शहर के कई हिस्सों में डेयरी संचालक सुबह होते ही अपने गाय और भैंसों को सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं। ये पशु दिनभर नगर निगम के कचरा घरों (डस्टबिन) और गंदगी के ढेरों के पास मुंह मारते नजर आते हैं। कचरे के इन ढेरों में केवल घर का अपशिष्ट नहीं, बल्कि घातक मेडिकल वेस्ट (खून से सनी रुई, दवाइयों की खाली शीशियां और एक्सपायर्ड टेबलेट्स) भी शामिल होता है। भूख मिटाने के चक्कर में ये बेजुबान पशु अनजाने में इन दवाओं और जहरीले कचरे का सेवन कर लेते हैं। ये रसायनिक तत्व पशुओं के मेटाबालिज्म में मिलकर उनके दूध तक पहुंच जाते हैं। कचरा खाने वाले पशुओं के दूध में हानिकारक तत्व सबसे गंभीर स्थिति तब होती है जब शाम को ये डेयरी संचालक इन पशुओं को वापस ले जाकर उनका दूध निकालते हैं और उसे शुद्ध बताकर ग्राहकों को बेच देते हैं।

डाक्टरों के अनुसार, कचरा खाने वाले पशुओं के दूध में कैडमियम, लेड और एंटीबायोटिक्स जैसे हानिकारक तत्वों के अंश हो सकते हैं। इस दूध का सेवन करने वाले नागरिकों, विशेषकर बच्चों में लिवर, किडनी और पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियों के साथ-साथ हार्मोनल असंतुलन का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इनका कहना है यह गंभीर विषय है कि मुनाफे के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जब भी किसी दूध देने वाले जानवर को एंटीबायोटिक का इंजेक्शन लगाया जाता है, तो हम किसानों को निर्देश देते हैं कि उस पशु का दूध अगले तीन से पांच दिनों तक इस्तेमाल न करें, क्योंकि दवा के अवशेष दूध में रहते हैं। लेकिन अक्सर किसान इसे नजरअंदाज कर देते हैं। इसी तरह पोल्ट्री में ''कोलिस्टिन'' जैसी ''लास्ट रिसार्ट'' एंटीबायोटिक, जो पूरी तरह प्रतिबंधित है, उसका भी चोरी-छिपे इस्तेमाल किया जा रहा है। यह सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ है, जिस पर हम निगरानी बढ़ा रहे हैं। - डा. अजय रामटेके, उपसंचालक, पशु चिकित्सा सेवाएं, भोपाल।

खेतों में किसी भी प्रकार के कीटनाशक या रसायनों का इस्तेमाल बहुत ही सीमित और विशेषज्ञों की सलाह पर ही करना चाहिए। एंटीबायोटिक्स का खेती में उपयोग मिट्टी और स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंताजनक है। विभाग द्वारा निरंतर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसमें हम किसानों को रसायनों के बजाय जैविक विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हमारा प्रयास है कि किसान प्राकृतिक खेती की ओर मुड़ें ताकि सुरक्षित और स्वस्थ फसल उपभोक्ताओं तक पहुंच सके। - सुमन प्रसाद, उप निदेशक (कृषि), जिला भोपाल।

यह भी पढ़ें- भोपाल में बिना पर्चे के धड़ल्ले से बिक रहीं एंटीबायोटिक्स; 3 करोड़ का रोजाना कारोबार, पर नियम हवा-हवाई

बैरसिया रोड स्थित एक कृषि व पशु दवा केंद्र के संचालक से नवदुनिया के रिपोर्टर की बातचीत...

रिपोर्टर: मुर्गियों का वजन नहीं बढ़ रहा और फसल पर भी कीड़ा लगा है। इसके लिए कोई दवा है?

दुकानदार: मुर्गियों के लिए कोलिस्टिन ले जाओ, दाने में मिलाकर दे देना, जल्दी वजन पकड़ेंगी। और फसल के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन का पाउच ले लो, सब कीड़ा-बैक्टीरिया साफ हो जाएगा।

रिपोर्टर: सुना है ये दवाएं बैन हैं या डाक्टर के पर्चे के बिना नहीं देनी चाहिए?

दुकानदार: सब किसान यही ले जाते हैं। बैन-वैन तो कागजों में है, माल बिक रहा है मतलब सब चालू है।

रिपोर्टर: इनके ज्यादा इस्तेमाल से कोई नुकसान तो नहीं होगा?

दुकानदार: फसल एकदम चमकदार दिखेगी और मुर्गियां भी बीमार नहीं पड़ेंगी। बस डोज सही रखना, वरना ज्यादा दवा से कई बार मुर्गियां सुस्त हो जाती हैं।

रिपोर्टर: क्या आप इनका रिकार्ड रखते हैं कि किसे कितनी दवा बेची?

दुकानदार: रिकार्ड का झंझट यहां कौन पाले। हम तो सीधे नगद पर देते हैं। कोई पर्चा नहीं मांगता और न ही हम देते हैं। रिपोर्टर: अगर कोई चेकिंग आ जाए तो? दुकानदार: चेकिंग वाले दुकानों पर आते हैं, गोदाम में नहीं। और वैसे भी, हम इसे ग्रोथ प्रमोटर बोलकर बेचते हैं, एंटीबायोटिक बोलकर नहीं।