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उज्जैन के 4000 साल पुराने इतिहास को खंगालेगा पुरातत्व विभाग, वैश्य टेकरी-दंगवाड़ा समेत कई जगहों की होगी वैज्ञानिक जांच

उज्जैन के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए मध्य प्रदेश पुरातत्व संचालनालय पूरे जिले में पुरास्थलों का नए सिरे से सर्वेक्षण की तैयारी कर रहा है। इसमें ता...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sun, 13 Sep 2026 11:23:38 AM (IST)Updated Date: Sun, 13 Sep 2026 11:53:57 AM (IST)
उज्जैन के 4000 साल पुराने इतिहास को खंगालेगा पुरातत्व विभाग, वैश्य टेकरी-दंगवाड़ा समेत कई जगहों की होगी वैज्ञानिक जांच
उज्जैन के 4000 साल पुराने इतिहास को खंगालेगा पुरातत्व विभाग (AI तस्वीर)

HighLights

  1. उज्जैन की धरती में छिपे चार हजार साल पुराने रहस्य की होगी तलाश
  2. ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति से जुड़े स्थलों का होगा नए सिरे से सर्वेक्षण
  3. इसके बाद चुनिंदा स्थानों पर उत्खनन और शोध की तैयारी

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। उज्जैन के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए मध्य प्रदेश पुरातत्व संचालनालय पूरे जिले में पुरास्थलों का नए सिरे से सर्वेक्षण की तैयारी कर रहा है। इसमें ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति से जुड़े स्थलों सहित अन्य ज्ञात और संभावित पुरास्थलों का अध्ययन किया जाएगा। सर्वेक्षण के बाद महत्वपूर्ण पाए जाने वाले स्थलों पर उत्खनन और शोध का काम किया जाएगा। इससे उज्जैन की प्राचीन बसाहटों, वहां बसने वालों के रहन-सहन और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़ी नई जानकारियां सामने आने की संभावना है।

उज्जैन की 4000 हजार वर्ष पुरानी संस्कृति

उज्जैन में ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति से जुड़े प्रमाण पहले मिल चुके हैं। यह संस्कृति लगभग 2000 वर्ष ईसा पूर्व की मानी जाती है। यानी यह करीब 4000 हजार वर्ष पुरानी संस्कृति है। कायथा, नागदा और दंगवाड़ा ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति के प्रमुख केंद्र रहे हैं। प्रस्तावित सर्वेक्षण में यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि प्राचीन लोगों ने बसाहट के लिए इस स्थान का चयन क्यों किया। इसके लिए पानी, खेती, जमीन, प्राकृतिक संसाधन, पशुपालन और आसपास मौजूद दूसरी बस्तियों का अध्ययन किया जाएगा।


पुरातत्व विभाग की टीम मौके पर जाकर कई स्थानों की जांच करेगी

प्रस्ताव के अनुसार रूनिजा, बड़नगर, महिदपुर, गढ़कालिका, दांगवाड़ा, वैश्य टेकरी और कुम्हार टेकरी सहित ज्ञात पुरास्थलों का अध्ययन किया जाएगा। नए स्थलों की भी तलाश की जाएगी। इसके लिए उपग्रह से प्राप्त चित्रों और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआइएस) की मदद ली जाएगी। इसके बाद पुरातत्व विभाग की टीम मौके पर जाकर इन स्थानों की जांच करेगी। महत्वपूर्ण पुरास्थलों की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें, ड्रोन से सर्वेक्षण और त्रि-आयामी (3-डी) प्रतिरूप तैयार किए जाएंगे।

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प्रत्येक स्थल की अलग पहचान संख्या के साथ उसका व्यवस्थित अभिलेख तैयार किया जाएगा। इसमें अशोककालीन स्तूप वैश्य टेकरी सहित अन्य पुरास्थलों को भी शामिल किया जाएगा। खेती, अतिक्रमण, अवैध उत्खनन, निर्माण, जल कटाव और शहरी विस्तार से प्रभावित होने वाले स्थलों को चिह्नित किया जाएगा। इसके आधार पर तय किया जाएगा कि किन पुरास्थलों को पहले संरक्षण की जरूरत है।