
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में पांच साल बाद राज्यसभा चुनाव में मतदान की नौबत आ रही है। 2020 में भी तीसरी सीट के लिए भी चुनाव हुआ था। 230 सदस्यीय विधानसभा में दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद एक सीट रिक्त है। एक सदस्य राज्यसभा भेजने के लिए 58 मतों की आवश्यकता होती है।
संख्या बल कांग्रेस के पास तो पर्याप्त यानी 58 से भी चार अधिक हैं। लेकिन भाजपा को तीसरी सीट के लिए आठ वोटों की आवश्यकता है, जिसे वह प्राप्त करने का प्रयास कर रही है। राज्यसभा की दो सीट जीतने के बाद भाजपा के पास 48 वोट बचेंगे। कांग्रेस की निर्मला सप्रे और एक अन्य विधायक के समर्थन का दावा पार्टी कर रही है। विधानसभा में दलीय स्थिति के अनुसार, भाजपा के पास 164 वोट हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो वह दो सीटें जीतने की स्थिति में हैं।
चूंकि, तीसरी सीट के लिए महेश केवट को मैदान में उतार दिया है, इसलिए भाजपा तभी सफल हो सकती है, जब उसे आठ अतिरिक्त वोट प्राप्त होंगे। यह भी तब जबकि कांग्रेस की सागर जिले की बीना सीट से विधायक निर्मला सप्रे और रतलाम की सैलाना सीट से भारत आदिवासी पार्टी के कमलेश डोडियार का मत भी भाजपा को मिले। पार्टी इन दोनों सदस्यों के वोट जोड़कर 50 सदस्यों का समर्थन मानकर चल रही है।
विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव एपी सिंह का कहना है कि प्रथम वरीयता के मतों के बाद द्वितीय वरीयता के मतों को गिना जाएगा। यदि प्रथम वरीयता में ही किसी उम्मीदवार को 58 वोट प्राप्त हो जाते हैं तो फिर आगे गणना की आवश्यकता ही नहीं होगी। उधर, भाजपा अपने प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस खेमे में सेंधमारी करने का प्रयास कर रही है और कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में लगी है।
राज्यसभा चुनाव में पार्टी द्वारा जारी व्हिप का कोई कानूनी आधार नहीं होता है। क्रास वोटिंग पर दल-बदल कानून भी लागू नहीं होता है। पार्टी के सदस्य मतदान के दिन अनुपस्थित भी हो जाएं तो विधायक के विरुद्ध कार्रवाई नहीं हो सकती है।
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दरअसल, कई बार यह विषय उठ चुका है और यह बात सामने आई कि यह मतदान सदन के भीतर नहीं बाहर का होता है, इसलिए इसे व्हिप से नहीं बांधा जा सकता है। विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदेव इसरानी का कहना है कि पार्टियां अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान के लिए उपस्थित रहने और मतदान करने के लिए व्हिप जारी कर सकती हैं, मगर इसके उल्लंघन पर दलबदल कानून के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती है। पार्टी अपने प्रविधान के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है।