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भोपाल के तालाब-पहाड़ियों पर मंडराया खतरा? Master Plan-2047 में 50-33 मीटर के पुराने नियम हटे

भोपाल मास्टर प्लान-2047 के ड्राफ्ट में जलस्रोतों और पहाड़ियों से निर्माण की तय दूरी हटाकर इको-सेंसिटिव जोन का प्रावधान किया गया है। विशेषज्ञों ने मनमा...और पढ़ें

By PANKAJ SHRIVASTAVAEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Tue, 29 Sep 2026 11:35:14 AM (IST)Updated Date: Tue, 29 Sep 2026 11:35:14 AM (IST)
भोपाल के तालाब-पहाड़ियों पर मंडराया खतरा? Master Plan-2047 में 50-33 मीटर के पुराने नियम हटे
भोपाल के तालाब-पहाड़ियों पर मंडराया खतरा। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. 1995 के मास्टर प्लान में निर्माण दूरी मीटरों में तय थी।
  2. 2047 ड्राफ्ट में जलस्रोतों से सुरक्षित दूरी स्पष्ट नहीं।
  3. बड़े तालाब से पहले 50 मीटर निर्माण प्रतिबंधित था।

पंकज श्रीवास्तव, नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल : 1995 के प्लान में पानी के स्रोतों से निर्माण की तय दूरी अंकों में लिखी थी, अब बड़े जोन का हवाला देकर अफसरों के हाथ में छोड़ी छूट, मनमानी बढ़ने का खतरा। पंकज श्रीवास्तव, नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल : झीलों की नगरी भोपाल की आबोहवा, पहचान और पर्यावरण का आधार यहां का बड़ा तालाब, कल-कल बहती बरसाती नदियां और शहर को घेरे हुए हरी-भरी पहाड़ियां हैं।

लेकिन अगले 20-25 सालों के विकास का खाका खींचने वाले भोपाल मास्टर प्लान-2047 के नए प्रारूप में इन प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी हो गई हैं। नए ड्राफ्ट में जल-स्रोतों, नहरों, नालों और पहाड़ियों के संरक्षण से जुड़े पुराने और सख्त नियमों को काफी ढीला कर दिया गया है। सबसे बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव यह सामने आया है कि वर्ष 1995 के पुराने मास्टर प्लान में पानी के किसी भी स्रोत के किनारे से कितनी दूरी तक निर्माण कार्य पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा, इसका पैमाना बिल्कुल साफ-साफ और अंकों में दर्ज था।


इसके विपरीत वर्ष 2047 के नए ड्राफ्ट से सुरक्षित दूरी का यह तय मीटर फार्मूला ही हटा दिया गया है। इसके स्थान पर केवल बड़े इको-सेंसिटिव जोन का सामान्य उल्लेख किया गया है, जिससे मैदानी अफसरों को व्यक्तिगत विवेक से फैसले लेने की खुली छूट मिल जाएगी और आगे चलकर जल-स्रोतों के किनारों पर कंक्रीट के जंगल और अतिक्रमण को बढ़ावा मिलने का अंदेशा गहरा गया है।

पहले साफ था हिसाब, अब केवल इको-सेंसिटिव जोन का नाम

  • वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में पर्यावरण को बचाने के लिए कड़े नियम थे। उस समय बड़े तालाब के किनारे 50 मीटर, कालियासोत, केरवा, शाहपुरा और लहारपुर जैसे बड़े जलाशयों के किनारों पर 33 मीटर तक किसी भी तरह के निर्माण पर पूरी रोक थी। कालियासोत नदी से 33 मीटर, मुख्य नहर से 30 मीटर और छोटे नालों से 3 मीटर दूर तक निर्माण प्रतिबंधित था।

  • लेकिन 2047 के नए ड्राफ्ट में तालाबों की संख्या तो 14 से बढ़ाकर 18 कर दी गई है, पर किनारों से सुरक्षित दूरी के मीटर तय नहीं किए गए हैं। इसकी जगह सिर्फ इको-सेंसिटिव जोन का सामान्य हवाला दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक नियम में दूरी साफ नहीं होगी, तब तक अफसरों को अपनी मर्जी से फैसले लेने की छूट मिल जाएगी, जिससे अवैध कब्जों का रास्ता खुलेगा।
  • पहाड़ियों के नाम तक गायब

    पुराने प्लान में शहर की खास पहाड़ियों जैसे श्यामला हिल्स, अरेरा हिल्स, चार इमली, ईदगाह और सिंगारचोली के नाम लिखकर निर्देश दिए गए थे कि इनके मूल स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। नए ड्राफ्ट में ढलान 8.5 डिग्री पर निर्माण रोकने की बात तो है, लेकिन किन पहाड़ियों को बचाना है, उनकी कोई साफ सूची नहीं दी गई है।

    सीधा गणित - 1995 बनाम 2047

    • बड़ा तालाब: 1995 में 50 मीटर तक निर्माण पर पूरी रोक थी। नए प्लान में निश्चित दूरी गायब है।
    • नदियां और जलाशय: पहले कालियासोत नदी व केरवा-शाहपुरा तालाब से 33 मीटर की दूरी अनिवार्य थी, अब सिर्फ बड़े जोन का नाम है।
    • नहर और नाले: पहले नहर से 30 मीटर और नालों से 3 मीटर का फासला रखना जरूरी था, नए प्लान में यह स्पष्ट पैमाना नहीं है।
    • पहाड़ियां: 1995 में श्यामला और अरेरा हिल्स समेत प्रमुख पहाड़ियों के नाम तय थे, नए ड्राफ्ट में नामवार सूची नहीं दी गई।

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    प्रो. एचएम मिश्रा (शहरी मामलों के विशेषज्ञ) - नियमों में ढिलाई से बढ़ेगी अफसरों की मनमानी

    1995 की योजना की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उसमें झीलों और नालों के किनारे सुरक्षित दूरी मीटर में लिखी थी। यदि नए ड्राफ्ट में निश्चित दूरी तय नहीं होगी और केवल बड़े इको-सेंसिटिव क्षेत्र लिखे जाएंगे, तो नियम लागू कराने में अफसरों के व्यक्तिगत विवेक की भूमिका बढ़ जाएगी। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा। सरकार को चाहिए कि तालाब और पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए पुराने सख्त और नापने योग्य नियम ही बहाल रखे।

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