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History of Bhopal: भोपाल में ताज-उल-मसाजिद के निर्माण के वक्त यहीं सुकून खोजती थीं शाहजहां बेगम, आज भी हैं हम्माम में पानी गर्म करने के इंतजाम

भोपाल में शाहजहां बेगम का 150 साल पुराना 'जनाना हम्माम' आज भी सुरक्षित है। इसमें रह रहे चिश्ती परिवार ने नवाबी वास्तुकला को सहेजते हुए सरकार के साथ इस...और पढ़ें

By Abrar KhanEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Tue, 20 Oct 2026 01:05:00 PM (IST)Updated Date: Tue, 20 Oct 2026 01:15:24 PM (IST)
History of Bhopal: भोपाल में ताज-उल-मसाजिद के निर्माण के वक्त यहीं सुकून खोजती थीं शाहजहां बेगम, आज भी हैं हम्माम में पानी गर्म करने के इंतजाम
शाहजहां बेगम ताज-उल-मसाजिद के निर्माण के वक्त यहीं सुकून खोजती थीं।

HighLights

  1. शाहजहां बेगम का 150 साल पुराना जनाना हम्माम है महफूज।
  2. इमारत में आज भी मौजूद है नवाबी दौर की नक्काशी।
  3. ऐतिहासिक हम्माम में 40 सालों से रह रहा चिश्ती परिवार।

मोहम्मद अबरार खान, नईदुनिया प्रतिनिधि। बाहर से आम मकान नजर आने वाली इस इमारत के भीतर नवाबी दौर की खास वास्तुकला आज भी अपनी पुरानी शान के साथ मौजूद है। छोटे दरवाजे से दाखिल होते ही गुंबद, विशाल छत, पुराने पत्थर और लकड़ी की नक्काशी ध्यान खींचती है। यह नवाब शाहजहां बेगम का जनाना हम्माम है। निजी मिल्कियत में होने के बावजूद इसकी मूल बनावट महफूज है।

करीब डेढ़ सौ साल पुरानी इस इमारत में रहने वाले अकबर चिश्ती यहां पिछले 40 वर्षों से रह रहे हैं। विरासती अहमियत को देखते हुए उन्होंने इसकी बनावट में कोई बड़ा बदलाव नहीं कराया। उनके मुताबिक, मिट्टी, चूने और अलग-अलग मसालों से बनी इमारत गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गर्म रहती है।


अब घर बन चुका है नवाबों का हम्माम

हम्माम के भीतर पानी भरने और गर्म करने के लिए बनाई गई जगहें आज भी मौजूद हैं। हालांकि अब यहां पहले की तरह स्नान नहीं होता। इमारत के अलग-अलग हिस्से बेडरूम, ड्राइंग रूम और डाइनिंग रूम के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। कभी नवाबी दौर में खास इंतजामों के साथ स्नान के लिए बनी इस जगह में अब एक परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी गुजरती है।

यहीं स्नान करने आती थीं शाहजहां बेगम

अकबर चिश्ती के मुताबिक, शाहजहां बेगम के दूसरे पति नवाब सिद्दीक हसन खान नूरमहल स्थित बालाखाने में रहते थे। अंग्रेजों ने उन्हें जीवन के अंतिम समय तक यहीं नजरबंद रखा था। बालाखाने के पास ही बेगम का यह हम्माम था। बताया जाता है कि ताज-उल-मसाजिद के निर्माण के दौरान शाहजहां बेगम दिन में मस्जिद का काम देखने जाती थीं और शाम को अक्सर इस हम्माम में स्नान करती थीं।

मस्जिद को पूरा होने में लगी थी एक सदी

मस्जिद का निर्माण शाहजहां बेगम के दौर में शुरू हुआ, लेकिन आर्थिक परेशानियों और अन्य कारणों से काम लंबे समय तक अधूरा रहा। मौलाना इमरान खान नदवी अजहरी की कोशिशों और लोगों के सहयोग से 1971 में निर्माण फिर शुरू हुआ और 1985 में मस्जिद पूरी हुई। इसके निर्माण में एक सदी लगी।

विरासत के संरक्षण को तैयार है चिश्ती परिवार

आज हम्माम का इस्तेमाल घर की तरह हो रहा है, लेकिन इसके गुंबद, पुरानी बनावट और पानी गर्म करने के इंतजाम नवाबी जीवनशैली और स्थापत्य कला की याद दिलाते हैं। अकबर चिश्ती का कहना है कि सरकार या किसी अन्य पक्ष के पास इसे इसी स्थिति में संरक्षित करने की योजना हो तो वे पूरा सहयोग करने को तैयार हैं। ऐसी इमारतों की पहचान और संरक्षण से भोपाल की विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकती है।

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