
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। क्या आपके बच्चे की ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन कम आया है? या कोई और जांच नार्मल नहीं है? हो सकता है कि आपका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो, लेकिन जिस पैमाने (स्केल) पर उसकी जांच हुई है, वह पैमाना ही अपने बच्चों के लिए सही न हो। बच्चों का इलाज कर रहे डाक्टर लंबे समय से इस दुविधा का सामना कर रहे हैं।
अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) इस दुविधा को खत्म करने की तैयारी में जुट गया। आइसीएमआर ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल और एम्स रायपुर को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार नया मानक तय करने के लिए शोध की जिम्मेदारी दी है। इस शोध परियोजना को टेरिप-2 नाम दिया गया है। इसके लिए 1.70 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
एम्स भोपाल में पैथोलाजी विभाग की अध्यक्ष डॉ वैशाली वाल्के इस अध्ययन का नेतृत्व करेंगी। उन्होंने नईदुनिया को बताया कि हम मध्य भारत के बच्चों और किशोरों के खून के सैंपल लेकर यह तय करेंगे कि भारतीय बच्चे के लिए नार्मल रेंज क्या होनी चाहिए।
डॉ वाल्के ने बताया कि बड़ों (वयस्कों) के लिए देसी मानक बनाने का काम (टेरिप-1) पहले से चल रहा है, अब फोकस बच्चों पर है। इस शोध के परिणाम आने के बाद देश के हर लैब में बच्चों की रिपोर्ट भारतीय मापदंडों के अनुसार जांची जाएगी, जिससे उपचार अधिक प्रभावी और सुरक्षित होगा।
सटीक इलाज : डॉक्टर को पक्के तौर पर पता होगा कि बच्चे को बीमारी है या नहीं। अंदाजे से इलाज नहीं होगा।
दवाइयों से मुक्ति : अगर बच्चे का प्वाइंट विदेशी चार्ट से थोड़ा ऊपर-नीचे है, लेकिन भारतीय चार्ट के हिसाब से सही है, तो उसे बेवजह दवाइयां नहीं खानी पड़ेंगी
बच्चों के स्वास्थ्य के लिए पश्चिमी देशों के डेटा पर निर्भरता खत्म कर अपने खुद के देसी मानक तैयार करना एक ऐतिहासिक कदम है। यह अध्ययन सही निदान और सुरक्षित उपचार सुनिश्चित करेगा, जिससे बेवजह की दवाओं और गलत इलाज पर रोक लगेगी। प्रो. डा. माधवानंद कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल