
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में खनन प्रभावित क्षेत्रों में नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की जवाबदेही कलेक्टर की होगी। इसके लिए हर जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में शिकायत निवारण प्रकोष्ठ का गठन किया गया है।
यदि किसी खनन प्रभावित क्षेत्र के नागरिक को लगता है कि विकास कार्य सही ढंग से नहीं हो रहे हैं या राशि का सही उपयोग नहीं हो रहा है तो वह अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है। इस प्रकोष्ठ के लिए अनिवार्य होगा कि वह 30 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की समस्या का समाधान करे।
दरअसल, खनिज साधन विभाग ने जिला खनिज प्रतिष्ठान नियम 2016 में संशोधन किया है। संशोधित नियम के तहत प्रदेश में 25 किमी तक के अप्रत्यक्ष और 15 किमी के दायरे में प्रत्यक्ष खदान प्रभावित क्षेत्रों का विकास होगा।
निधि का उपयोग जल शोधन संयंत्र, पेयजल के लिए वितरण नेटवर्क, जल स्रोतों के प्रदूषण की रोकथाम, वायु और धूल प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय, जल निकासी प्रणाली के साथ प्रदूषण नियंत्रण तंत्र विकसित करने में होगा।
जिला खनिज प्रतिष्ठान (डीएमएफ) निधि का 70 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से खदान प्रभावित क्षेत्रों के जरूरतमंदों के पक्के आवास, शुद्ध पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च होगा। बची हुई 30 प्रतिशत राशि से बड़ी अधोसंरचना जैसे खेत-खलिहानों को जोड़ने वाले पुल-सड़क, चेक डैम और ड्रिप सिंचाई जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे सीधे तौर पर स्थानीय किसानों व ग्रामीणों को लाभ पहुंचे।
नए नियमों का मूल भाव पूरी तरह से खनन प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना और समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को राहत पहुंचाना है। इसके लिए जिलों में पांच वर्ष की एक सुदृढ़ विकास कार्ययोजना बनाई जा रही है।
इसके साथ ही प्रदेश के 10 प्रमुख जिलों में डीएमएफ निधि के 3,147.10 करोड़ रुपये से स्थानीय विकास भी चिह्नित कर कार्य शुरू कर दिया है। जिला खनिज निधि के अंतर्गत जमा की गई राशि केवल जिलों के बैंक खातों में रखी जाएगी।
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