MP में साइबर ठगी का नया तरीका; खाते होल्ड होने से पहले एटीएम से कैश निकाल रहे जालसाज
साइबर ठग म्यूल खातों में रकम जमा करने के बाद अपने लोगों के जरिए एटीएम से नकदी निकलवा रहे हैं, जिससे पुलिस के लिए आरोपितों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है।
Publish Date: Sun, 08 Nov 2026 01:18:17 PM (IST)Updated Date: Sun, 08 Nov 2026 01:19:01 PM (IST)
प्रतीकात्मकHighLights
- एटीएम से निकाल रहे ठगी की रकम
- बैंकों में तीन माह में मिट जाते हैं साक्ष्य
- सीसीटीवी रिकॉर्डिंग अधिकतम तीन माह तक सुरक्षित
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। साइबर ठगी के मामलों में आरोपित अब ठगी की राशि को बैंक खातों में ज्यादा समय तक रखने के बजाय एटीएम के माध्यम से नकद निकाल रहे हैं, लेकिन पुलिस के लिए रकम निकालने वालों तक पहुंचना चुनौती बन गया है। दरअसल, एटीएम से नकदी निकालने वाले व्यक्ति की पहचान के लिए वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकार्डिंग अहम साक्ष्य होती है।
तीन माह तक ही सुरक्षित रहती रिकॉर्डिंग
बैंकों के पास यह रिकार्डिंग अधिकतम तीन माह तक ही सुरक्षित रहती है। ठगी की शिकायत मिलने, बैंक खातों का विश्लेषण करने और संबंधित एटीएम की पहचान कर फुटेज मांगने की प्रक्रिया में अकसर इतना लंबा समय लग जाता है कि तब तक रिकार्डिंग ही सुरक्षित नहीं रहती।
साइबर मुख्यालय ने इस वर्ष एटीएम से साइबर ठगी की राशि निकालने वालों की पहचान के लिए दो बार विशेष अभियान चलाया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में इस संबंध में मात्र छह एफआइआर दर्ज हो सकीं। इसकी बड़ी वजह जांच में होने वाली देरी और सीसीटीवी फुटेज की सीमित उपलब्धता है।
खाते से नकदी निकालना इसलिए सरल
म्यूल (किराये के) खातों में डाली गई ठगी की राशि शिकायत मिलने पर बैंक होल्ड कर देते हैं। ऐसे में ठग कई खातों में राशि डालने के बाद अपने लोगों के माध्यम से एटीएम से नकद निकालवा लेते हैं। इसके बाद रकम किसके पास पहुंची, इसका पता लगाना और मुश्किल हो जाता है।
साइबर मुख्यालय के अधिकारियों का कहना है कि लगभग हर ठगी में कुछ राशि बाद में एटीएम से निकाली जाती है। अब हर माह की रिपोर्ट से होगी पहचान एसपी साइबर प्रणय नागवंशी के अनुसार, अब ऐसे एटीएम चिह्नित किए जा रहे हैं, जहां से साइबर ठगी की सबसे अधिक राशि निकाली गई है। इन एटीएम से संबंधित बैंकों को तीन माह से अधिक समय तक सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के लिए कहा जाएगा।
इसके साथ ही हर माह की रिपोर्ट के आधार पर राशि निकालने वालों की पहचान करने की तैयारी की जा रही है, ताकि जांच शुरू होने तक महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट न हों।