
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। सरकार ने नियमित कर्मचारियों का महंगाई भत्ता दो प्रतिशत बढ़ा दिया है, लेकिन इस फैसले से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) समेत कई विभागों में सालों से काम कर रहे हजारों संविदा कर्मचारियों में नाराजगी है। नियमित कर्मचारियों को डीए, वेतन वृद्धि, बोनस और दूसरी सुविधाएं मिल रही हैं, वहीं संविदा कर्मचारी आज भी अपने हक के लिए लड़ रहे हैं।
संविदा कर्मचारियों का कहना है कि उनसे नियमित कर्मचारियों जैसा ही काम लिया जाता है। योजनाओं, राष्ट्रीय कार्यक्रमों और जनहित की सेवाओं की बड़ी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है, लेकिन जब लाभ देने की बारी आती है, तो उन्हें संविदा बताकर अलग कर दिया जाता है। नीतियां, आदेश और आश्वासन तो बहुत मिलते हैं, लेकिन जमीन पर उनका फायदा नहीं पहुंचता। ऐसा लगता है कि संविदा नीतियां सिर्फ कागजों तक ही रह गई हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार न्याय आयोग संगठन की प्रांत प्रमुख ममता हिरवे ने कहा कि महंगाई किसी का पद या नियुक्ति का तरीका देखकर नहीं बढ़ती। बाजार में खाना, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान और रोज की जरूरतों के दाम सबके लिए एक जैसे बढ़े हैं, फिर मार सिर्फ संविदा कर्मचारियों पर क्यों? क्या उनका परिवार महंगाई से प्रभावित नहीं होता?
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उन्होंने सरकार से मांग की है कि संविदा कर्मचारियों को भी महंगाई के हिसाब से राहत और डीए का लाभ मिले, दीपावली जैसे त्योहारों पर बोनस या सहायता राशि दी जाए, सालों से काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन में सम्मानजनक वृद्धि हो, ग्रेड-पे और वेतनमान की गड़बड़ी दूर हो और नीतियों का असली लाभ सभी पात्र कर्मचारियों तक पहुंचे। साथ ही उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा भी पक्की की जाए।
ममता हिरवे ने कहा कि संविदा कर्मचारी दोयम दर्जे के नहीं हैं। वे भी शासन व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं और अपनी मेहनत से योजनाओं को सफल बना रहे हैं। अब उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, असली आर्थिक लाभ और सम्मानजनक अधिकार मिलने चाहिए।