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दतिया उपचुनाव का नया संकेत, ग्वालियर-चंबल में BSP की जगह ले सकती है ASP, 2028 में बनेगा बड़ी चुनौती!

ग्वालियर-चंबल अंचल में दलित राजनीति का अपना स्थान है। इसी वजह से कभी यहां बसपा का अच्छा प्रभाव हुआ करता था। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में बसपा जैसा ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Thu, 06 Aug 2026 05:52:54 PM (IST)Updated Date: Thu, 06 Aug 2026 05:52:54 PM (IST)
दतिया उपचुनाव का नया संकेत, ग्वालियर-चंबल में BSP की जगह ले सकती है ASP, 2028 में बनेगा बड़ी चुनौती!
दतिया उपचुनाव का नया संकेत

HighLights

  1. दतिया उपचुनाव में आसपा प्रत्याशी को मिले 14.3% वोट
  2. दामोदर यादव ने भाजपा-कांग्रेस दोनों के समीकरण बिगाड़े
  3. 2028 के चुनाव में दलित वोट पाना पार्टियों के लिए चुनौती

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। ग्वालियर-चंबल अंचल में दलित राजनीति का अपना स्थान है। इसी वजह से कभी यहां बसपा का अच्छा प्रभाव हुआ करता था। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में बसपा जैसा प्रभाव आजाद समाज पार्टी (आसपा) भी दिखा सकती है। ऐसा संकेत दतिया उपचुनाव में मिला है। आसपा प्रत्याशी दामोदर यादव ने उपचुनाव को न केवल त्रिकोणीय मुकाबले में बदला बल्कि 22,527 वोट यानी 14.3 प्रतिशत वोट प्राप्त किए।

आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट हो रहा है कि दामोदर यादव ने बसपा और कांग्रेस के वोटबैंक में तो सेंध लगाई ही, भाजपा को भी प्रभावित किया। बता दें, उपचुनाव में भाजपा 6,016 वोटों से चुनाव हारी। दलित और ओबीसी (यादव) वोटों के इस नए समीकरण ने भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बिगाड़ दिया।


त्रिकोणीय मुकाबले से बदला हार-जीत का अंतर, नरोत्तम मिश्रा समर्थकों पर भी आरोप

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार दामोदर यादव ने जो त्रिकोणीय मुकाबला खड़ा किया, उसने मुख्य रूप से सत्ता विरोधी वोट यानी दलित मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया। यदि दामोदर यादव को मिले वोटों का एक छोटा हिस्सा भी भाजपा के पाले में जाता तो हार-जीत का अंतर बदल सकता था। उनके मजबूत प्रदर्शन को भाजपा की हार का एक मुख्य कारण माना जा रहा है।

इसकी पुष्टि भी दामोदर यादव के बयान से होती है। उन्होंने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने अंतिम समय में रणनीतिक भ्रम फैलाकर उनके समर्थकों के वोट कांग्रेस की तरफ डायवर्ट कर दिए गए। पार्टी सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जो भाजपा कार्यकर्ता नाराज थे, उनमें से बहुत लोगों ने कांग्रेस का सहयोग न कर दामोदर यादव को किया। दूसरी ओर, भाजपा की सफाई आई कि भले ही पार्टी उप चुनाव हार गई हो, लेकिन वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार दतिया में लगभग 1,700 वोट अधिक मिले हैं।

वर्ष 2028 के लिए चुनौती होंगे दलित वोट

दतिया उपचुनाव ग्वालियर-चंबल की राजनीति के लिए पार्टियों को संकेत दे रहा है कि वर्ष 2028 के चुनाव दलित वोट पाना चुनौती होगा। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में इस अंचल के दलित मतदाताओं ने एकतरफा रुख अपनाकर पूरे क्षेत्र का राजनीतिक परिणाम बदल दिया था। इस कारण 15 साल बाद राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा और कांग्रेस की सरकार बनी थी।

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दलित वोटों के बदलाव का संकेत सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम में किए गए बदलावों के विरोध में दो अप्रैल 2018 को भारत बंद के दौरान मिल गया था। बंद में व्यापक हिंसा हुई थी और आठ लोग मारे गए थे। वर्ष 2018 में कांग्रेस ने इस अंचल की 34 में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वर्ष 2013 में कांग्रेस को सिर्फ 12 सीटें मिली थीं। भाजपा सिमटकर मात्र सात सीटों पर रह गई जबकि वर्ष 2013 में भाजपा ने यहां 20 सीटें जीती थीं।