
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। महिला अधिवक्ता वीणा गौतम का नाम गुंडा सूची में दर्ज करने और उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई करने के मामले में पुलिस अधिकारियों को जिला अदालत से राहत मिली है। न्यायाधीश अजय पेंदाम की अदालत ने निचली अदालत के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया गया था।
अदालत ने माना कि आपराधिक मामलों के रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस द्वारा की गई निवारक कार्रवाई को महज इस आधार पर दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता कि बाद में एसडीएम न्यायालय ने प्रकरण निरस्त कर दिया।
भोपाल जिला बार एसोसिएशन के वर्ष 2019-21 के चुनाव के दौरान वरिष्ठ महिला अधिवक्ता वीणा गौतम ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन थाना प्रभारी और उप निरीक्षक ने द्वेषवश उनके खिलाफ झूठा इस्तगासा तैयार किया। पुलिस ने 22 सितंबर 2020 को उनका नाम थाने की गुंडा सूची में क्रमांक 721 पर दर्ज किया और प्रकरण एसडीएम नजूल न्यायालय भेजा था।
एसडीएम न्यायालय ने तीन दिसंबर 2021 को प्रकरण को चलने योग्य नहीं मानते हुए निरस्त कर दिया था। इसके बाद वीणा गौतम ने पुलिस कार्रवाई से उनकी प्रतिष्ठा धूमिल होने का आरोप लगाते हुए दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति के लिए सिविल दावा पेश किया। निचली अदालत ने उनका दावा स्वीकार करते हुए पुलिस अधिकारियों पर दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति तय की थी। इसके खिलाफ पुलिस अधिकारियों ने जिला अदालत में अपील की थी।
जिला अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि वीणा गौतम के खिलाफ ऐशबाग थाने में तीन आपराधिक मामले दर्ज थे। पुलिस ने इन्हीं आपराधिक प्रकरणों को आधार बनाकर उनका नाम गुंडा सूची में दर्ज किया और निवारक कार्रवाई के लिए प्रकरण एसडीएम न्यायालय भेजा था। हालांकि, एसडीएम न्यायालय ने उन्हें आदतन अपराधी नहीं माना और प्रकरण निरस्त कर दिया।
जिला अदालत ने माना कि एसडीएम न्यायालय द्वारा प्रकरण निरस्त किया जाना अपने आप में पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पुलिस ने उपलब्ध आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की थी। ऐसे में निचली अदालत द्वारा पुलिस अधिकारियों पर क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं था।
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अदालत ने इन आधारों पर निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए पुलिस अधिकारियों पर लगाया गया दो लाख रुपये का हर्जाना खत्म कर दिया। बुधवार को सुनाए गए इस फैसले में जिला अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी निवारक कार्रवाई का बाद में न्यायिक स्तर पर निरस्त हो जाना मात्र इस आधार पर संबंधित पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण नहीं बना देता।