
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भले ही 20 वर्ष बाद भोपाल मास्टर प्लान प्लान (विकास योजना) का ड्राफ्ट लागू कर दिया गया हो, लेकिन अन्य शहरों के लिए ऐसी स्थिति नहीं बनी है। इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर जैसे शहरों का मास्टर प्लान स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और हितधारकों के दबाव में अटका हुआ है। यह हितधारक बिल्डर, कालोनाइजर हैं और दूसरी ओर हैं शासकीय एजेंसियां।
इसी तरह सागर, सतना और रीवा के पुराने मास्टर प्लान के समय सीमा भी पूरी हो चुकी हैं। सागर और उज्जैन के मास्टर प्लान तैयार किए जा चुके हैं लेकिन इन्हें विजन-2047 के तहत अपडेट किया जा रहा है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे का कहना है कि प्रदेश के अन्य शहरों का मास्टर प्लान जल्द लाया जाएगा, इसकी प्रक्रिया चल रही है। बता दें, समय सीमा स्पष्ट नहीं की गई है।
मास्टर प्लान न होने से इन शहरों का अनियोजित विकास हो रहा है। एनजीटी सहित अन्य न्यायालयों में शहरों के विकास से जुड़े कई प्रकरण विचाराधीन हैं। सरकार का तर्क है कि जबलपुर और ग्वालियर को मेट्रोपालिटन रीजन के रूप में विकसित करने के सरकारी तैयारी है।
ऐसे में इन शहरों के लिए सिर्फ शहरी सीमा नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और कस्बों को जोड़कर लैंड यूज, ट्रांसपोर्ट, रिंग रोड, आवास, उद्योग, ड्रेनेज और ग्रीन एरिया का दीर्घकालिक प्लान बनाया जाना प्रक्रियाधीन है।
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इंदौर का पिछला मास्टर प्लान एक जनवरी, 2008 से लागू हुआ था। समय अवधि 31 मार्च 2021 को समाप्त हो गई। जबलपुर के मास्टर प्लान प्लान के अवधि भी वर्ष 2008 से शुरू होकर वर्ष 2021 तक के लिए थी। ग्वालियर के लिए इससे पहले मास्टर प्लान 2005 और उसके बाद संशोधित मास्टर प्लान 2021 प्रभावी था, जिसकी अवधि वर्ष 2021 में समाप्त हो गई।