
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। चेक बाउंस होने के मामले में तीन दिन पहले नागपुर से गिरफ्तार मध्य प्रदेश कैडर के पूर्व आइएएस अधिकारी रमेश थेटे के विरुद्ध लोकायुक्त संगठन में 25 मामले पंजीबद्ध हैं। इनमें अभियोजन की स्वीकृति भी संबंधित विभागों से नहीं मिली है। अधिकतर प्रकरण पद के दुरुपयोग के हैं।
उज्जैन में अपर आयुक्त रहते सीलिंग की जमीन के आवंटन में गड़बड़ी के आरोप और पद के दुरुपयोग के मामले में उनके विरुद्ध वर्ष 2013 में 22 प्रकरण कायम किए गए थे। मामलों में राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों को भी आरोपित बनाया गया था। वर्ष 2013 से इन प्रकरणों में अभियोजन चलाने की स्वीकृति मांगी जा रही है, जो नहीं मिली है।
बता दें कि साढ़े 11 लाख रुपये का चेक बाउंस होने के आरोप में दर्ज प्रकरण पर भोपाल पुलिस ने थेटे को 28 अक्टूबर को गिरफ्तार कर भोपाल की जिला कोर्ट में प्रस्तुत किया था। यहां से उन्हें मुचलके पर सशर्त छोड़ दिया गया।
वहीं, इस संबंध में रमेश थेटे ने कहा कि उज्जैन की अपर आयुक्त न्यायालय के मामले थे। न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के रूप में हमने कई मामलों में निर्णय लिया था। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ही आदेश पारित किए थे। हमारे निर्णयों को हाई कोर्ट ने सही माना है।
न्यायालयीन कार्य में भी अगर इस तरह की आपत्ति होगी तो फिर तो कभी कोई जज निर्णय ही नहीं करेगा। मध्य प्रदेश में अकेले थेटे ही नहीं विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त में 35 वर्तमान व पूर्व आइएएस और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के विरुद्ध भी प्रकरण दर्ज हैं। कुछ मामले तो 15 से 20 वर्ष पुराने हैं।
सेवानिवृत्त होने के बाद अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) में अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता संबंधित विभाग को नहीं पड़ती थी। पूर्व डीजी लोकायुक्त अजय शर्मा का कहना है कि वर्ष 2018 में एक्ट में संशोधन के बाद चाहे जितने वर्ष पहले सेवानिवृत्ति हुई हो, स्वीकृति जरूरी हो गई है। पहले यह लाभ था कि आरोपित के सेवानिवृत्त होते ही चालान प्रस्तुत कर दिया जाता था।
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