डिजिटल डेस्क, भोपाल। आईएएस की पहचान, सरकारी ओहदे का रौब और पर्यटन विभाग के होटल की लीज का भरोसा... इन्हीं दावों के सहारे लोगों को जाल में फंसाने वाली तृप्ति सिंह के खिलाफ अब ठगी का एक और मामला सामने आया है।
बागसेवनिया थाने में दर्ज चौथी एफआईआर में आरोप है कि तृप्ति ने भाई और साथी के साथ मिलकर होटल लीज पर दिलाने के नाम पर एक व्यक्ति से 50 लाख रुपये ऐंठ लिए। मामला खुलने के बाद अब पुलिस यह तलाश रही है कि फर्जी अफसर बनकर ठगी का यह खेल कितने लोगों तक फैला है।
खुद को मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (एमपीएसटीडीसी) में एडिशनल डायरेक्टर और आईएएस अधिकारी बताकर लोगों से ठगी करने वाली तृप्ति सिंह के खिलाफ भोपाल में एक और एफआईआर दर्ज हुई है। बागसेवनिया थाना पुलिस ने होटल लीज पर दिलाने का झांसा देकर 50 लाख रुपये ठगने के आरोप में तृप्ति सिंह, उसके भाई सुधांशु सिंह और साथी प्रखर के खिलाफ धोखाधड़ी समेत अन्य धाराओं में प्रकरण दर्ज किया है।
इसके साथ ही तृप्ति के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या चार हो गई है। भोपाल और अशोकनगर में उसके खिलाफ अब दो-दो मामले दर्ज हैं।
होटल लीज के नाम पर 50 लाख लिए
सिवनी निवासी 31 वर्षीय गगन उपवंशी ने बागसेवनिया थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उसका आरोप है कि तृप्ति सिंह, सुधांशु सिंह और प्रखर ने उसे भरोसा दिलाया कि वे एमपीएसटीडीसी का होटल लीज पर दिला सकते हैं। आरोपियों ने होटल दिलाने का भरोसा देकर उससे कुल 50 लाख रुपये लिए।
काफी समय बीतने के बाद भी जब होटल लीज पर नहीं मिला तो गगन को संदेह हुआ। उसने आरोपियों के बारे में अपने स्तर पर जानकारी जुटाई। इस दौरान उसे पता चला कि तृप्ति सिंह आईएएस अधिकारी नहीं है। इसके बाद उसने 28 अगस्त को बागसेवनिया थाने में शिकायत दी।
पुलिस ने करीब पांच दिन जांच के बाद मंगलवार देर रात तृप्ति, सुधांशु और प्रखर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।
प्रोडक्शन वारंट पर भोपाल लाएगी पुलिस
तृप्ति सिंह फिलहाल अशोकनगर जेल में बंद है। बागसेवनिया थाना पुलिस उसे प्रोडक्शन वारंट पर भोपाल लाने के लिए रवाना हो गई है। रिमांड मिलने के बाद पुलिस उससे पूछताछ करेगी। पुलिस को उम्मीद है कि पूछताछ में ठगी के नेटवर्क, इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों और इसमें शामिल अन्य लोगों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।
39.17 लाख की ठगी का केस पहले से दर्ज
बागसेवनिया थाने में तृप्ति सिंह और उसके कथित गैंग के खिलाफ पहले से भी एक मामला दर्ज है। बालाघाट जिले की खैरलांजी तहसील के चिचोली निवासी 29 वर्षीय रोहित लिल्हारे की शिकायत पर दर्ज इस मामले में भी होटल-रिसॉर्ट लीज पर दिलाने और नौकरी लगवाने का झांसा देने का आरोप है।
रोहित के अनुसार, तृप्ति ने खुद को ट्रेनी आईएएस और एमपीएसटीडीसी में एडिशनल डायरेक्टर बताया था। आरोप है कि होटल-रिसॉर्ट लीज के नाम पर 35.30 लाख रुपये और नौकरी लगवाने के नाम पर 3.87 लाख रुपये लिए गए।
कुल 39.17 लाख रुपये लेने के बावजूद न होटल मिला और न नौकरी। पैसे वापस मांगने पर तृप्ति ने कथित तौर पर केवल एक लाख रुपये ऑनलाइन लौटाए।
चंदेरी से शुरू हुआ था ठगी का सिलसिला
पुलिस के मुताबिक, तृप्ति सिंह राजपूत, उसका भाई सुधांशु सिंह, तनुज वैश्य और अंजली सिंह 7 अप्रैल 2025 को चंदेरी पहुंचे थे। चारों किला कोठी में ठहरे थे। आरोप है कि यहां तृप्ति ने खुद को एमपीएसटीडीसी का एडिशनल डायरेक्टर बताया।
इसके बाद उसने जयकुमार कोली, विजय कुमार दुबे, ऋतिक शर्मा और राघव सोनी को सरकारी नौकरी लगवाने का भरोसा दिया। इसके बदले तीन लाख रुपये प्रति व्यक्ति मांगे गए। पुलिस के अनुसार, फरियादियों ने भरोसा कर कुल 9.80 लाख रुपये नकद दिए और अपने जरूरी दस्तावेज भी सौंपे। दो लाख रुपये बाद में देने की बात हुई थी।
फर्जी कागजों से लेकर ‘अधिकारी किट’ तक की जांच
पुलिस रिमांड के दौरान भोपाल में तृप्ति और सुधांशु के घर से मामले से जुड़े दस्तावेजों की प्रतियां बरामद की गई थीं। पुलिस के अनुसार, महंगे आईफोन की खरीद की रसीदें, महंगे होटलों में ठहरने और हवाई यात्रा से जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं।
पुलिस अब यह जांच कर रही है कि इन वस्तुओं और दस्तावेजों का इस्तेमाल सुनियोजित तरीके से तृप्ति की ऐसी छवि बनाने के लिए किया गया था या नहीं, जिससे वह सरकारी अधिकारी के रूप में लोगों के सामने खुद को पेश कर सके।
भारत सरकार की नेम प्लेट लगी इनोवा भी बरामद
पुलिस ने एक इनोवा कार भी बरामद की है, जिस पर भारत सरकार की नेम प्लेट लगी होने की बात सामने आई है। बताया गया है कि तृप्ति अलग-अलग स्थानों पर आने-जाने के लिए इसी कार का इस्तेमाल करती थी।
अब पुलिस यह पता लगा रही है कि कार पर नेम प्लेट किसने तैयार कराई, उसे किस उद्देश्य से लगाया गया और क्या इसके जरिए लोगों के बीच सरकारी अधिकारी होने का भ्रम पैदा किया जाता था।
पुलिस के मुताबिक, पूरे मामले में तृप्ति द्वारा कथित तौर पर बनाई गई फर्जी सरकारी पहचान, उसके संपर्कों, दस्तावेजों और ठगी के नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ा जा रहा है। नई एफआईआर के बाद पुलिस की जांच का दायरा और बढ़ गया है।