
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। एम्स भोपाल में 30वां किडनी प्रत्यारोपण सफल रहा। अंतिम अवस्था की किडनी बीमारी से जूझ रहे मरीज को नई किडनी लगाई गई। सघन निगरानी में इलाज के बाद मरीज को पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
मरीज को प्रत्यारोपण से पहले लंबे समय से हफ्ते में दो बार डायलिसिस करवाना पड़ रहा था। अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ने पर उन्हें आपात स्थिति में एम्स में भर्ती किया गया था। जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से खराब हो चुकी हैं। इसके बाद ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता बचा था।
यह प्रत्यारोपण सड़क हादसे में ब्रेन-डेड घोषित हुए मरीज शिवानी के परिजनों के अंगदान से संभव हो सका। हादसे में युवक के दिमाग को ऐसा नुकसान पहुंचा था, जो ठीक नहीं हो सकता था। दुख की इस घड़ी में भी परिजनों ने बड़ा दिल दिखाते हुए अंगदान का फैसला लिया। उनके इस फैसले से एक लिवर और दो किडनी दान हुईं, जिससे तीन अलग-अलग लोगों को नया जीवन मिला।
यह सफलता यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, सीटीवीएस और एनेस्थीसिया विभाग की टीमों के संयुक्त प्रयास से मिली। फैकल्टी, सीनियर रेजिडेंट और ट्रांसप्लांट समन्वयकों ने दिन-रात मेहनत की। अंग निकालने की प्रक्रिया से लेकर जटिल प्रत्यारोपण तक, एम्स भोपाल अब क्षेत्र में कैडेवर अंगदान कार्यक्रम में अहम भूमिका निभा रहा है।
इस मौके पर एम्स के विशेषज्ञों ने हाई ब्लड प्रेशर के छिपे खतरों के बारे में आगाह किया। एम्स भोपाल के यूरोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केतन मेहरा ने कहा कि बिना लक्षण वाला और ठीक से इलाज न किया गया हाई बीपी किडनी फेल होने की बड़ी वजह है। इसके अलावा डायबिटीज, बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक दर्द की दवाएं लेना, पथरी, ऑटोइम्यून बीमारियां और जन्मजात समस्याएं भी किडनी खराब कर सकती हैं।
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