
एमपी डेस्क। 1 नवंबर 1956 की वह सुबह केवल देश के नक्शे पर एक नए राज्य के अस्तित्व में आने की तारीख नहीं थी, बल्कि विंध्य, मध्य भारत, महाकौशल और भोपाल रियासत के ऐतिहासिक महामिलन का महापर्व थी। जब देश के केंद्र में 'हिंदुस्तान का दिल' पहली बार विधिवत आकार ले रहा था, तब नवाबी शहर भोपाल को एक दुल्हन की तरह सजाया गया था। शहर की आबोहवा में ऐसा उत्साह था मानो तय वक्त से कई दिन पहले ही दीवाली का त्योहार आ गया हो।
पुराने भोपाल के प्रमुख बाजारों, चौराहों और सरकारी इमारतों को रंग-बिरंगी रोशनियों से नहला दिया गया था। तत्कालीन विधानसभा भवन मिंटो हॉल और राजभवन के आसपास सुरक्षा के कडे इंतजामों के बीच ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए भारी जनसैलाब उमडा था। नवगठित राजधानी का मुख्य समारोह 'लाल परेड ग्राउंड' पर आयोजित हुआ, जहां ठीक सुबह पंडित रविशंकर शुक्ल ने राज्य के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर और डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने राज्यपाल के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। शपथ ग्रहण संपन्न होते ही राजधानी का आसमान जोरदार आतिशबाजी और पटाखों की गूंज से दहल उठा और पूरे शहर में मिठाइयां बांटकर खुशियां मनाई गईं।
नवगठित मध्य प्रदेश को एक साझा सांस्कृतिक पहचान देने के लिए सरकार और कला अकादमियों ने देशभर के चोटी के कलाकारों को इस मंच पर उतारा था। बस्तर और मंडला से आए गोंड और बैगा नर्तकों ने कर्मा और सैला नृत्य से समां बांध दिया, तो वहीं बुंदेलखंड का राई, मालवा का मटकी और निमाड के गणगौर लोक कलाकारों की टोलियां अपनी पारंपरिक वेशभूषा में भोपाल की सडकों और मंचों पर थिरकती नजर आईं।
शास्त्रीय संगीत की दुनिया से ग्वालियर और मैहर घराने की समृद्ध विरासत इस उत्सव की शान बनी। महान उस्ताद अलाउद्दीन खां की परंपरा से जुडे ऐतिहासिक 'मैहर बैंड' और स्थानीय संगीतकारों के दल ने अपनी धुनों से समारोह में सुर बिखेरे, जबकि 'मालवा के कबीर' कहे जाने वाले पंडित कुमार गंधर्व और तत्कालीन शास्त्रीय दिग्गजों के सुरों से पूरी फिजा गूंज उठी। इसके साथ ही भोपाल की गंगा-जमुनी तहजीब भी मंच पर पूरी गरिमा के साथ खिली; स्थापना दिवस की पूर्व संध्या और रात को आयोजित भव्य मुशायरे और कवि सम्मेलन में भोपाल, इंदौर और ग्वालियर के स्थानीय शायरों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के कवियों ने नवगठित राज्य की एकता और भाईचारे पर अपनी रचनाएं पेश कीं।
उस दौर में भोपाल एक शांत और छोटा शहर हुआ करता था, लेकिन अचानक राजधानी बनने और पूरे देश से शीर्ष नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों तथा कलाकारों के पहुंचने से शहर के होटलों, धर्मशालाओं और सड़कों पर उत्सव का मेला लग गया था।
विंध्य प्रदेश, मध्य भारत (इंदौर-ग्वालियर), भोपाल और सीपी-बरार (महाकौशल) के विलय से उपजी किसी भी आशंका को दूर कर सबको एक सूत्र में बांधने के लिए ही इस सांस्कृतिक समागम को इतना भव्य रूप दिया गया था। 1 नवंबर 1956 को शुरू हुआ यह सफर आज सात दशकों के पड़ाव को छू रहा है, लेकिन उस पहली रात की रोशनी, लोक वाद्यों की थाप और सुरों का वह ऐतिहासिक संगम आज भी मध्य प्रदेश के इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है।
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