
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल : प्रदेश की लाइफलाइन कही जाने वाली 108 एंबुलेंस सेवा इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। मरीजों की जान बचाने के लिए चौबीसों घंटे तैनात रहने वाली एंबुलेंस अब शहरों के गली-मोहल्लों में स्थित छोटे-मोटे गैरेजों में खड़ी नजर आ रही हैं। तकनीकी खराबियों के कारण बड़ी संख्या में वाहन सेवा से बाहर हो चुके हैं।
राजधानी भोपाल सहित पूरे प्रदेश में कई एंबुलेंस लंबे समय से खराब पड़ी हैं। वेंडरों और सर्विस सेंटरों का करोड़ों रुपये का भुगतान महीनों से लंबित है। इसी कारण उन्होंने गाड़ियों की मरम्मत करने से हाथ खींच लिए हैं। गैरेज संचालकों का कहना है कि जब तक पुराने बिलों का भुगतान नहीं होता, वे नई गाड़ियों पर काम नहीं करेंगे। भुगतान अटकने के चलते जीवनरक्षक वाहन कबाड़ में तब्दील होते जा रहे हैं।
जांच में सामने आया है कि एंबुलेंस संचालन करने वाली एजेंसी के पास अपना आधुनिक और सुविधायुक्त मेंटेनेंस सेंटर मौजूद है, जहां सभी गाड़ियों की मरम्मत संभव है। इसके बावजूद एंबुलेंस को बाहर के निजी मैकेनिक और छोटे गैरेजों में भेजा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे कमीशनखोरी और भुगतान को उलझाने की रणनीति भी बताई जा रही है। बाहर मरम्मत कराने से न तो गुणवत्ता की निगरानी हो पा रही है और न ही बिलों में पारदर्शिता बनी रहती है।
इस अव्यवस्था का सबसे ज्यादा असर आम जनता पर पड़ रहा है। हार्ट अटैक, सड़क दुर्घटना या अन्य गंभीर आपात स्थितियों में जब परिजन 108 पर कॉल करते हैं, तो अक्सर जवाब मिलता है कि एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है या पहुंचने में काफी समय लगेगा। बड़ी संख्या में वाहन मेंटेनेंस के अभाव में खड़े होने से फील्ड में एंबुलेंस की भारी कमी हो गई है।
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। कई जगह मरीजों को निजी वाहनों से अस्पताल ले जाना पड़ रहा है, जबकि कुछ मामलों में इलाज में देरी के कारण जान तक चली जा रही है। गैरेज संचालकों और स्पेयर पार्ट्स सप्लायरों का कहना है कि वे काम करने को तैयार हैं, लेकिन कंपनी द्वारा बिल पास नहीं किए जा रहे। छोटे दुकानदारों के लिए लाखों रुपये का बकाया लंबे समय तक सहन करना संभव नहीं है।
किसी का पैमेंट रुका है तो उसको पूरा किया जाएगा। वैसे 108 का खुद का यार्ड है, लेकिन कभी-कभी वाहनों को बाहर भी सुधरवाना पड़ता है।
-तरुण सिंह परिहार, मैनेजर, जय अंबे, 108 एंबुलेंस सेवा