
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। राज्य सरकार इस वित्तीय वर्ष में (31 मार्च तक) अधोसंरचना विकास कार्यों पर एक लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी। वर्ष के शुरुआती छह माह में राज्य सरकार ने 37 हजार करोड़ रुपये कर्ज लिया है, जबकि केंद्र ने पूरे वित्तीय वर्ष के लिए 87 हजार करोड़ रुपये ऋण सीमा निर्धारित की है। अच्छी बात है कि इसमें अधिकांश राशि अधोसंरचना विकास पर ही खर्च की जा रही है।
सरकार का स्पष्ट रुख है कि ऋण का उपयोग विकास और पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए किया जाए, न कि नियमित राजस्व व्यय के लिए। यह इस बात से साफ हो रहा है कि सरकार सड़क, एक्सप्रेस-वे, सिंचाई, बांध, नहर, विद्युत, मेडिकल कॉलेज, स्कूल-कॉलेज और अन्य बड़ी अधोसंरचना परियोजनाओं पर कर्ज की राशि खर्च कर रही है।
इसमें केन-बेतवा लिंक परियोजना और पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक परियोजनाएं भी शामिल हैं। कांग्रेस बार-बार आर्थिक स्थिति पर श्वेत पत्र लाने की मांग कर रही है। कर्ज को लेकर बजटीय प्रबंधन पर सवाल उठा रही है।
उधर, सरकार ने साफ किया है कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक राशि की व्यवस्था के लिए राज्य सरकार राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित ऋण सीमा के अधीन आरबीआई के माध्यम से ऋण लेती है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जब राज्य सरकार बांध, नहर, सड़क, एक्सप्रेस-वे और विद्युत जैसी परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से कार्य करती है, तो उनके लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता भी होती है।
वित्त विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि विकास कार्यों के संबंध में राशि जुटाने के लिए राज्य शासन ने किसी भी टैक्स में असामान्य बढ़ोतरी की जगह जीएसडीपी के अनुरूप निर्धारित ऋण सीमा और राज्य के स्वयं के संसाधनों से राशि जुटाई जा रही है, जिससे जनता पर अतिरिक्त कर का बोझ न पड़े।
उनका यह भी कहना है कि मप्र का वित्तीय प्रबंधन अत्यंत मजबूत माना जाता है। इसी कारण पूर्व वर्षों में लिए गए ऋणों का शत-प्रतिशत पुनर्भुगतान समय पर हो रहा है। अच्छी बात है कि प्रदेश ने पुनर्भुगतान के इस वित्तीय दायित्व को निभाने में कभी भी डिफॉल्ट नहीं किया है।
वेतन तथा लाड़ली बहना जैसी सामाजिक दायित्व की योजनाओं जैसे दैनंदिन राजस्व व्यय के लिए सरकार द्वारा पृथक से कोई ऋण नहीं लिया जाता। आरबीआई के ई-कुबेर प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्टेट डेवलपमेंट लोन (एसडीएल) के लिए प्रतिस्पर्धी बोलियां प्राप्त की जाती हैं। इसके तहत आरबीआई के माध्यम से बाजार से न्यूनतम और अनुकूल ब्याज दरों पर ऋण लिया जाता है।
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आर्थिक मामलों के जानकार देवेंद्र विश्वकर्मा का कहना है कि निर्धारित सीमा में कोई भी सरकार कर्ज लेती है और उसे विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है। इसके लाभ सरकार और जनता दोनों को मिलते हैं।
उदाहरण के तौर पर उज्जैन में महाकाल महालोक बना, अन्य विकास कार्य हो रहे हैं तो इससे वहां पर्यटन बढ़ गया है। कुल मिलाकर इसका अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर होता है। राज्य सरकारें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित ऋण सीमा के भीतर आवश्यकतानुसार समय-समय पर आरबीआई के माध्यम से ऋण लेती हैं और समय-समय पर उसका पुनर्भुगतान भी करती हैं।
संविधान के अनुच्छेद 293(3) के तहत राज्य सरकारें केंद्र सरकार की सहमति से ऋण लेती हैं, जिसकी वार्षिक सीमा सामान्यतः सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अधिकतम तीन प्रतिशत होती है।
जीएसडीपी में बढ़ोतरी होने से राज्य सरकारों की ऋण लेने की क्षमता भी बढ़ जाती है। सड़क, बिजली, बांध और नहर जैसी विकास परियोजनाओं से जीएसडीपी में वृद्धि हुई और इससे राज्य सरकार की अधिक ऋण लेने की क्षमता भी बनी है।
वित्तीय प्रबंधन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मानक ऋण-जीएसडीपी अनुपात होता है जो मप्र का 32.53 प्रतिशत है। यह निर्धारित मानकों के अनुरूप है। वित्तीय प्रबंधन का एक अन्य मानक, ब्याज भुगतान एवं राजस्व प्राप्तियों का अनुपात भी मात्र 10-11 प्रतिशत बना हुआ है, जो अत्यंत सुरक्षित स्तर है।