
धनंजय प्रताप सिंह, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तत्कालीन कमल नाथ सरकार ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में जब इसे चुनौती देने की बारी आई तो कांग्रेस ने सीधी लड़ाई के बजाय ओबीसी महासभा को आगे कर दिया।
अब जब विधानसभा का शीतकालीन सत्र आ रहा है तो कांग्रेस ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने के लिए संकल्प ला रही है। कांग्रेस इस संकल्प के जरिये भाजपा की घेराबंदी करना चाहती है, ताकि वह इसका राजनीतिक लाभ ले सके।
दरअसल, भाजपा के सामने संकट यह है कि विधानसभा में यदि वह संकल्प का विरोध करती है तो कांग्रेस को लाभ मिलेगा और समर्थन करती है तो एसटी-एससी और सवर्ण नाराज होंगे। मध्य प्रदेश में ओबीसी वोटर लगभग 48 प्रतिशत हैं, इसलिए दोनों ही दल इन्हें साधने में लगे रहते हैं।
दरअसल, ओबीसी आरक्षण पर सियासत के इस खेल की शुरुआत 2019 से होती है जब कमल नाथ सरकार ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का अध्यादेश लाई थी। इसे हाई कोर्ट में चुनौती मिली और जस्टिस रवि श्रीवास्तव की बेंच ने 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का हवाला देकर इस पर रोक लगा दी।
इसके बाद से प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत पर ही अटका है और भर्तियां 87-13 के फार्मूले पर हो रही हैं। जब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की बारी आई तो कांग्रेस ने खुद पैरवी करने के बजाय रणनीति बदली और ओबीसी महासभा और पिछड़ा वर्ग संगठनों को आगे कर दिया।
पार्टी का अंदरूनी आकलन था कि सुप्रीम कोर्ट में इंदिरा साहनी केस की 50 प्रतिशत की बाधा नहीं टूटेगी और हार से पार्टी पर आरक्षण विरोधी का लेबल लग जाएगा।
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अब कांग्रेस विधानसभा में संकल्प लाकर भाजपा को उसी के जाल में फंसाना चाहती है। कांग्रेस का प्लान है कि भाजपा अगर संकल्प का विरोध करती है तो उसे ओबीसी विरोधी बताया जाए और अगर समर्थन करती है तो गेंद केंद्र सरकार के पाले में चली जाएगी कि 50 प्रतिशत की सीमा हटाने के लिए संविधान संशोधन लाए। भाजपा इस समय बैकफुट पर है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मांग की है कि यदि भाजपा सरकार की नीयत साफ है, तो वह तुरंत विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए और नया अध्यादेश लाकर आरक्षण पारित करे।