
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। अभियोजन विभाग में पिछले कुछ वर्षों से गजब चल रहा है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया एलएलबी की डिग्री को पूर्णकालिक बताता है, यानी एलएलबी करते हुए कुछ और करने की अनुमति नहीं है। अभियोजन विभाग ने अपने तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को नौकरी करते हुए वह डिग्री लेने की अनुमति दे रखी है। अब उसी डिग्री के आधार पर 89 कर्मचारियों को पदोन्नत कर सहायक जिला अभियोजन अधिकारी (एडीपीओ) बनाने की तैयारी है।
दरअसल, अभियोजन विभाग के पदोन्नति नियमों में एलएलबी की डिग्री वाले क्लर्क ग्रेड कर्मचारियों को पदोन्नति देकर एडीपीओ बनाने का प्रविधान है। इसका फायदा उठाने के लिए विभाग के कर्मचारी नौकरी में आने के बाद डिग्री लेने की कोशिश करते हैं। बार काउंसिल के नियम इस तरह एलएलबी की डिग्री लेने को अवैध बताते हैं, लेकिन खुद कानून का संरक्षक विभाग उसकी अनदेखी करके कर्मचारियों को बेजा लाभ पहुंचाता रहा है।
कुछ महीनों पहले भोपाल के अधिवक्ता शिवपूजन सिंह चौहान ने सूचना का अधिकार कानून से इसकी जानकारी मांगी थी। पता चला कि पिछले 13 वर्षों में विभाग अपने 162 कर्मचारियों को काम करते हुए एलएलबी करने की अनुमति जारी कर चुका है। उनमें से अधिकतर पदोन्नत होकर एडीपीओ बन भी गए।
2020 में इसे लेकर जबलपुर उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर हुई थी। रोहन शर्मा की ओर से दायर याचिका में मध्य प्रदेश शासन, संचालक लोक अभियोजन सहित अन्य पक्षकार हैं। याचिका में नौकरी करते हुए एलएलबी करने और उससे जुड़े सेवा लाभ पर सवाल उठाए गए हैं। इस याचिका पर एक सुनवाई बुधवार को ही होनी है।
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मार्च 2022 में सीमा वाहाने बनाम मध्य प्रदेश शासन मामले में उच्च न्यायालय ने अभियोजन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए यह जांचने के निर्देश दिए थे कि संबंधित कर्मचारी को जिस कानून पाठ्यक्रम की अनुमति दी गई, वह वास्तव में अंशकालिक था या नहीं? न्यायालय ने अभियोजन विभाग से पिछले 15 वर्षों का रिकॉर्ड भी मांगा था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि समान परिस्थितियों में कर्मचारियों को किस आधार पर कानून की पढ़ाई करने की अनुमति दी गई। लेकिन विभाग ने यह रिकार्ड कभी उपलब्ध ही नहीं कराया।