
अनुज मैना, नईदुनिया, भोपाल। प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च मरीज और उसके परिवार के लिए पहले ही बड़ी चुनौती है। ऊपर से दवाओं, इंजेक्शन और इलाज में इस्तेमाल होने वाले छोटे-छोटे सामान की कीमतों पर अस्पतालों की मनमानी का बोझ भी उठाना पड़ता है। कई अस्पतालों में मरीज के परिजनों को बाहर से दवाएं और मेडिकल सामान खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती।
अस्पताल के अपने मेडिकल स्टोर से ही खरीदारी की मजबूरी के बीच सामान्य बाजार कीमत से कई गुना अधिक वसूली की शिकायतें कई बार सामने आती रही हैं। इस मनमानी से राहत दिलाने की मांग पर देश की दवा मूल्य नियामक संस्था ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।
अस्पतालों में ग्लव्स, सिरिंज, कैथेटर और दूसरे मेडिकल सामान की कीमतों पर नियंत्रण, बाहर से दवाएं खरीदने की आजादी और बिल में खरीद कीमत का ब्योरा देने जैसी मांगों पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने साफ कहा है कि ये उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।
एनपीपीए ने यह बात आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र के जवाब में कही है। चंद्रशेखर गौड़ ने पत्र में प्राइवेट अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामान की बिक्री पर अधिकतम 30 प्रतिशत मुनाफे की सीमा तय करने जैसी पांच मांगें की थीं। उनका तर्क था कि अस्पतालों में मरीज के परिजनों को कई बार वहीं के मेडिकल स्टोर से सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे में बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध ग्लव्स, सिरिंज और अन्य सामान अस्पताल में कई गुना महंगे दाम पर खरीदना पड़ता है।
शिकायत की मांग और उस पर एनपीपीए का जवाब इस प्रकार है...
पत्र के जवाब में एनपीपीए की सदस्य सचिव एस. अहलादिनी पांडा ने अपने जवाब में कहा कि ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने के लिए एनपीपीए ने अपनी 152वीं प्राधिकरण बैठक में गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन युक्तिकरण लागू किया है। इसकी विस्तृत जानकारी प्राधिकरण की वेबसाइट पर उपलब्ध है। वहीं, डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने, मरीजों को अपनी पसंद की फार्मेसी और जांच केंद्र चुनने, अस्पतालों की बिलिंग में पारदर्शिता तथा मरीज अधिकार चार्टर से जुड़े मुद्दे एनपीपीए के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं।
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