
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों में रहने वाले भांडेर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक फूल सिंह बरैया ने एक बार फिर विवादित बयान दिया है।
उन्होंने बोला कि अनुसूचित जाति (एससी)-अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सांसद-विधायकों की स्थिति जानवरों जैसी है। इन्हें कोई अधिकार नहीं है। वे यहीं नहीं रुके, आगे कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में हनुमान जी की प्रतिमा बांटी जा रही है, कोशिश करें कि वे हिंदू न बन पाएं।
जब वे मंच से यह बयान दे रहे थे तब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सहित वरिष्ठ नेता मौजूद थे पर किसी ने उन्हें नहीं टोका-रोका। उधर, प्रदेश कांग्रेस ने बरैया के बयान से किनारा कर कहा कि ये उनके व्यक्तिगत विचार हो सकते हैं। पार्टी को कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा ने इसे कांग्रेस की सहमति और मानसिक दिवालियापन बताया।
भोपाल में दलित-आदिवादियों के लिए तैयार किए जा रहे दस्तावेज 'भोपाल डिक्लेरेशन- दो' के सम्मेलन में बरैया ने मंगलवार को चुनाव व्यवस्था के संदर्भ में अपनी बात रखते हुए कहा कि डा.भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संयुक्त चुनाव व्यवस्था में हमारे प्रतिनिधियों (एससी-एसटी) की स्थिति ऐसी हो जाएगी जैसे अमर्यादित शब्द को प्रयोग करते हुए... मुंह पर बंधी पट्टी हो। वो काटना तो दूर भौंक तक नहीं पाएगा।
स्थिति में सुधार तभी आ सकता है जब अलग चुनाव व्यवस्था हो। हमारे लिए निर्धारित क्षेत्र से एक कमेटी बने, जो प्रत्याशी का चयन करे और उसी वर्ग के लिए मतदान करके प्रतिनिधि का चुनाव करें। तभी वे हमारी बात रख पाएंगे। अभी दबाव में रहते हैं। आज देश में जाति-धर्म ऊपर है और संविधान पीछे।
राजनीतिक बराबरी तो कुछ हद तक मिली पर सामाजिक-आर्थिक बराबरी नहीं। आदिवासी क्षेत्रों में हनुमान जी की प्रतिमा बांटी जा रही हैं। हम कोशिश करें कि हमारा आदिवासी हिंदू ना बन पाए। इसकी अपनी अलग पहचान है।
दुर्भाग्यपूर्ण है बयान- प्रदेश कांग्रेस के संगठन महामंत्री संजय कामले ने कहा कि बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। संविधान में सभी के बराबरी की बात है। व्यक्ति के निजी विचार हो सकते हैं। पार्टी का ऐसा कोई विचार नहीं है और ना ही ऐसी स्थिति है। सार्वजनिक मंचों पर ऐसे बयान नहीं देना चाहिए।
मानसिक दिवालियापन- उधर, भाजपा के प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया लगातार अनर्गल बयान देते रहते हैं। कभी एससी-एसटी तो कभी महिलाओं के बारे में बोलते हैं पर कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी रहती है, जो मौन सहमति को दर्शाता है। कांग्रेस बंटावरे की राजनीति करना चाहती है। इस तरह की भाषा मानसिक दिवालियापन है, जिसे कानूनी और सामाजिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता है।