
सौरभ सोनी, नईदुनिया। भोपाल। चीता पुनर्स्थापना परियोजना के तहत कूनो राष्ट्रीय उद्यान में घास के मैदान अपेक्षित मात्रा में विकसित नहीं किए गए, इससे शाकाहारी वन्य प्राणियों की कमी बनी हुई है। चीतों को पर्याप्त शिकार नहीं मिल पा रहा है। इस बीच चीतों की संख्या भी बढ़ी है और वे मानव बस्तियों में घुसकर पालतू मवेशियों का शिकार कर रहे हैं।
दरअसल, चीतों को खुले जंगल में छोड़ने से पहले कई सुरक्षा उपायों जैसे घास के मैदानों का विकास और ग्रामीणों के विस्थापन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इससे चीतों के कूनो के जंगल से बाहर पड़ोसी राज्यों में पलायन और मवेशियों के शिकार के मामले बढ़े हैं।
विशेषज्ञों ने चीतों को खुले जंगल में छोड़ने से पहले उनकी सुरक्षा के उपाय करने की बात कही थी लेकिन अमल नहीं हुआ। वन विभाग दावा करता है कि प्रत्येक चीते की निगरानी में पांच वनकर्मी रहते हैं, लेकिन चीतों की अप्राकृतिक मृत्यु ने निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े किए हैं।
कूनो में कई किस्तों में अब तक 1500 चीतल (हिरण की एक प्रजाति) छोड़े जा चुके हैं लेकिन यहां तेंदुओं की मौजूदगी के चलते चीतों को पर्याप्त शिकार नहीं मिल पा रहा है। इस क्षेत्र में तेंदुए हर उस जगह पर हैं, जहां चीतल, जंगली सूअर, हिरण जैसे शिकार उपलब्ध हैं। चीता तेंदुओं से दूरी बनाकर रखता है। एक अहम बात यह भी है कि कूनो राष्ट्रीय उद्यान 25 चीतों की संख्या के हिसाब से उपयुक्त माना गया था। फिलहाल शावकों सहित यहां 52 चीते हैं।
मैंने विभाग में रहते हुए बार-बार यही बात कही थी कि चीतों के लिए प्राकृतिक तरीके से शिकार उपलब्ध कराने का प्रयास होना चाहिए। चीतल या अन्य शाकाहारी वन्य जीव कूनो में छोड़ भी दिए गए और इनकी सुरक्षा नहीं हुई तो इसका कोई मतलब नहीं। पहली प्राथमिकता वन्य जीवों की सुरक्षा बढ़ाना होनी चाहिए। इससे स्वत: जंगल बढ़ेंगे और वन्य जीव भी आएंगे। वीएन अम्बाड़े, सेवानिवृत्त वन बल प्रमुख, मध्य प्रदेश।