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MP के सांची में गजलक्ष्मी के स्वरूप, 2000 साल पुराने तोरण द्वारों पर अंकित है प्रतिमाएं

मध्य प्रदेश के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची स्तूप के करीब 2000 साल पुराने तोरण द्वारों पर गजलक्ष्मी की चार अलग-अलग शिल्पकृतियां अंकित हैं। इनमें देवी कमल पर खड़ी और विराजमान मुद्रा में दिखाई देती हैं।

By Daksha VaidkarEdited By: bhupendra Singh Rajput
Publish Date: Sun, 08 Nov 2026 08:52:42 AM (IST)Updated Date: Sun, 08 Nov 2026 08:52:42 AM (IST)
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MP के सांची में गजलक्ष्मी के स्वरूप, 2000 साल पुराने तोरण द्वारों पर अंकित है प्रतिमाएं
चारों शिल्पों में देवी के दोनों ओर हाथी अपनी सूंड से उनका अभिषेक करते नजर आते हैं। ये प्रतिमाएं प्राचीन भारतीय कला और धार्मिक मान्यताओं की विशिष्ट झलक प्रस्तुत करती हैं। नईदुनिया।

HighLights

  1. सांची के तोरण द्वारों पर गजलक्ष्मी के चार स्वरूप
  2. हाथियों द्वारा देवी का जलाभिषेक करते हुए प्रतिमाएं
  3. देवी कमल पर खड़ी और विराजमान मुद्रा में दिखाई देती

नईदुनिया, प्रतिनिधि भोपाल। दीपावली पर धन, समृद्धि, ऐश्वर्य और सौभाग्य की प्रतीक मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। लक्ष्मी के अनेक स्वरूपों में गजलक्ष्मी का रूप अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इस स्वरूप में देवी के दोनों ओर हाथी दिखाई देते हैं, जो अपनी सूंड से उनका जलाभिषेक करते हैं।

गजलक्ष्मी का यह अंकन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय कला, संस्कृति और धार्मिक समन्वय की भी कहानी कहता है। इसका एक खास उदाहरण मध्य प्रदेश के सांची स्तूप के तोरण द्वारों पर देखने को मिलता है।


2 हजार साल पुराना महत्व


करीब 2000 साल पुराने इन तोरण द्वारों पर गजलक्ष्मी की चार अलग-अलग शिल्पकृतियां उकेरी गई हैं। यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल सांची स्तूप के निर्माण की शुरुआत तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के शासनकाल में हुई थी। बाद में शुंग और सातवाहन काल में इसका विस्तार और अलंकरण किया गया। इसके चार भव्य तोरण द्वारों का निर्माण लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ माना जाता है।

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प्रचलित हैं जातक कथाएं

इन पर जातक कथाओं, बुद्ध के जीवन प्रसंगों, यक्ष-यक्षिणियों के साथ गजलक्ष्मी का अंकन भी मिलता है। चारों शिल्पों में देवी की मुद्रा और हाथियों की आकृतियों में अलग-अलग विशेषताएं दिखाई देती हैं।


चार शिल्पों में गजलक्ष्मी के अलग-अलग रूप

- पहली शिल्पाकृति में देवी कमल के आधार पर खड़ी मुद्रा में हैं। दोनों ओर हाथी और उनके ऊपर कमलाकार सज्जा दिखाई देती है।

- दूसरी आकृति में देवी अपेक्षाकृत छोटी हैं और दोनों ओर के हाथी उनका जलाभिषेक करते नजर आते हैं।

- तीसरी शिल्पाकृति में देवी बड़े कमल आसन पर विराजमान हैं। उनके दोनों ओर हाथियों के साथ नीचे कमल और वनस्पतियों का अंकन है।

- चौथी आकृति में देवी कमल पर बैठी हैं। दोनों हाथी लगभग समान मुद्रा में अपनी सूंड से उनका अभिषेक करते दिखाई देते हैं।

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सातवाहन काल में निर्मित हुए तोरण द्वारों में गजलक्ष्मी

बौद्ध धर्म में लक्ष्मी से साम्यता रखने वाली देवी वसुधारा हैं। वज्रयान परंपरा में उन्हें धन, समृद्धि, सौभाग्य और प्रचुरता की देवी माना जाता है। सांची के तोरण द्वारों पर अंकित प्रतिमाओं में हाथियों द्वारा देवी का जलाभिषेक है, इसलिए ये आदि रूप में गजलक्ष्मी हैं।

भारतीय परंपरा में विभिन्न धर्मों/संप्रदायों ने एक-दूसरे के प्रतीकों और मान्यताओं को समन्वय की दृष्टि से अपनाया है। बौद्ध धर्म में भी अनेक प्रतीकों को मांगलिक चिह्न के रूप में स्वीकार किया गया।

सातवाहन काल में निर्मित सांची के तोरण द्वारों पर विभिन्न विषयों के शिल्पांकन हैं, जिनमें गजलक्ष्मी का अंकन भी है, जिन्हें कतिपय विद्वान भगवान बुद्ध की माता महामाया देवी के रूप में भी स्वीकर करते हैं। - डॉ. शिवकांत बाजपेयी, अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल सर्कल

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