MP में Online Attendance बना 'जी का जंजाल', ई-अटेंडेंस के लिए नेटवर्क की खोज में छत पर और पानी की टंकी पर नजर आ रहे शिक्षक
मध्य प्रदेश में शिक्षकों के लिए ऑनलाइन एटेंडेंस लगाना बड़ी समस्या बनी हुई है। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क नहीं होने के कारण शिक्षकों को उपस ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 09 Jan 2026 11:55:36 PM (IST)Updated Date: Sat, 10 Jan 2026 12:05:31 AM (IST)
नेटवर्क की तलाश में परेशान शिक्षकHighLights
- ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में शिक्षक परेशान
- उपस्थिति के लिए शिक्षकों को स्कूल की छत पर चढ़ना पड़ रहा
- ई-एटेंडेंस के बिना स्कूल शिक्षा विभाग ने वेतन काटने का आदेश है
नवदुनिया प्रतिनिधि,भोपाल। प्रदेश भर के करीब चार लाख शिक्षकों की उपस्थिति हमारे शिक्षक एप के माध्यम से एक जुलाई से ऑनलाइन उपस्थिति अनिवार्य की गई है। पहले तो प्रदेश के 50 फीसद शिक्षक ही ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कर रहे थे, लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग ने वेतन काटने का आदेश दिया।
इसके बाद 90 फीसद से अधिक शिक्षक उपस्थिति दर्ज कराने लगे, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में नेटवर्क नहीं आने के कारण शिक्षक परेशान हो रहे हैं। इसमें शिक्षकों को सेल्फी भी अपलोड करना है। ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाकों में मोबाइल नेटवर्क की बदहाली के चलते शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूलों की छतों और पानी की टंकियों पर चढ़कर हाजिरी लगाने को मजबूर हैं।
रतलाम, रायसेन, श्योपुर,अलीराजपुर सहित कई जिलों में शिक्षकों को नेटवर्क नहीं मिल रहा है। राजधानी में भी गिन्नौरी, निशातपुरा, खजूरीकलां सहित ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों के शिक्षक छत पर या बाहर ग्राउंड में निकलकर ऑनलाइन उपस्थिति लगा रहे हैं।
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सिग्नल न मिलने के कारण शिक्षक स्कूल की सबसे ऊंची इमारतों, छतों और पानी की टंकियों पर चढ़कर मोबाइल हाथ में लेकर घंटों नेटवर्क ढूंढते नजर आते हैं।आनलाइन उपस्थिति के चक्कर में सुबह का कीमती समय बर्बाद हो रहा है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।
शिक्षकों का दर्द कि पढ़ाएं या उपस्थिति दर्ज कराएं
शिक्षकों का कहना है कि वे ऑनलाइन उपस्थिति के विरोधी नहीं हैं, लेकिन बुनियादी ढांचा तैयार किए बिना इसे थोपना गलत है। उन्होंने बताया कि हमें सुबह आठ बजे से पहले लॉग-इन करना होता है। अगर नेटवर्क नहीं मिला तो हम अनुपस्थित मान लिए जाते हैं।अपनी हाजिरी बचाने के लिए हमें रोज छत पर या पानी की टंकी पर चढ़ना पड़ता है।