संगीतमय महानाट्य के जरिए दर्शाई महाराज विक्रमादित्य की कीर्तिगाथा, मंत्रमुग्ध हुए दर्शक
राजधानी में स्थित मप्र जनजातीय संग्रहालय में महानाट्य 'सम्राट विक्रमादित्य' की प्रस्तुति के साथ तीन दिवसीय विक्रमोत्सव का हुआ आगाज। ...और पढ़ें
By Ravindra SoniEdited By: Ravindra Soni
Publish Date: Tue, 21 Dec 2021 03:34:26 PM (IST)Updated Date: Tue, 21 Dec 2021 03:34:26 PM (IST)

भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ के तीन दिवसीय विक्रमोत्सव-2021 का रंगारंग उद्घाटन मप्र जनजातीय संग्रहालय के सभागार में महानाट्य की प्रस्तुति के साथ हुआ। इस अवसर पर शोधपीठ के निदेशक श्रीराम तिवारी ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य पर केंद्रित आयोजन प्राय: उज्जैन तक ही सीमित रहते आए हैं, जबकि विक्रम की कीर्ति सार्वभौमिक रही है। इसी दृष्टि से विक्रमोत्सव श्रृंखला को उज्जैन के परकोटे से बाहर निकाल कर पहली बार भोपाल लाया गया है।
यह समारोह श्रृंखला पुणे, बनारस, प्रयागराज, पटना अहमदाबाद, चंडीगढ़ आदि सांस्कृतिक केंद्रों पर भी आयोजित होगी। विक्रमोत्सव के पहले दिन संजय मालवीय के निर्देशन में विशाला सांस्कृतिक एवं लोकहित समिति, उज्जैन के कलाकारों ने महानाट्य 'सम्राट विक्रमादित्य" की शानदार प्रस्तुति दी। संवाद और म्यूजिक रिकार्डेड था।
कथा-कहानियों को जीवंत करता महानाट्य : मध्य प्रदेश का पहला और देश का दूसरा महानाट्य उन कथा-कहानियों को जीवंत करता है जो हमने बचपन में सुनीं थी। आज जिस आधुनिक समय में हम जी रहे हैं और भागती जीवनशैली में हम उन नायकों को भूलते जा रहे हैं जिन्होंने भारत को गढ़ा है, उनका जीवंत स्मरण यह नाटक कराता है। पात्र-बहुलता इसे यथार्थ की प्रतिकृति बनाती है। दो घंटे के महानाट्य में सम्राट विक्रमादित्य के संपूर्ण कालखंड का संयोजन किया गया। जन्म से लेकर सम्राट बनने तक की संपूर्ण गाथा न्याय, वीरता, ज्ञान, दान, सहनशीलता, धैर्य, बुद्धि, पराक्रम आदि अनेकानेक गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व सम्राट विक्रमादित्य पर
केंद्रित है। दस से अधिक गीतों ने नाटक को गति प्रदान की और दर्शकों को बांधे रखा। इस महानाट्य की प्रथम परिकल्पना वर्तमान में मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डा. मोहन यादव ने की थी। शो में विद्युत एवं प्रकाश की आधुनिक तकनीक का सुंदर संयोजन देखने को मिला।
जोखिमभरा था प्रयोग : निर्देशक संजय मालवीय ने बताया कि यह एक जोखिम भरा प्रयोग था, जिसको एक रचनात्मक चुनौती मानकर उसे समय के सच्चे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। भोपाल में यह प्रस्तुति थी।