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क्या आपकी कॉलोनी वैध है? बस एक क्लिक में खुलेगी बिल्डर्स की कुंडली, MP में नए डिजिटल सिस्टम से घर बैठे मिनटों में करें चेक

अब प्लॉट या फ्लैट खरीदने से पहले ऑनलाइन पता चल सकेगा कि कॉलोनी वैध है या अवैध, साथ ही रेरा और अन्य मंजूरियां भी एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगी।

By Digital DeskEdited By: bhupendra Singh Rajput
Publish Date: Mon, 13 Jul 2026 02:48:44 PM (IST)Updated Date: Mon, 13 Jul 2026 02:48:44 PM (IST)
क्या आपकी कॉलोनी वैध है? बस एक क्लिक में खुलेगी बिल्डर्स की कुंडली, MP में नए डिजिटल सिस्टम से घर बैठे मिनटों में करें चेक
प्रतीकात्मक फोटो, एआई से तैयार की गई है।

HighLights

  1. अब प्लॉट या फ्लैट खरीदने से पहले ऑनलाइन पता चल सकेगा कि कॉलोनी वैध है या अवैध
  2. रेरा और अन्य मंजूरियां भी एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगी, एक क्लिक में पूरी जानकारी
  3. गलत जानकारी देने वाले आर्किटेक्ट/इंजीनियरों के लाइसेंस पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रहेगा

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश में मकान या फ्लैट खरीदने वालों के साथ-साथ खुद का आशियाना बनाने वाले नागरिकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। राज्य सरकार ने नगरीय निकायों में लागू ऑटोमैटिक बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम को अपग्रेड कर ABPAS 3.0 लागू कर दिया है।

इस नए सिस्टम के आने के बाद अब लोग घर बैठे सिर्फ एक क्लिक से यह जांच सकेंगे कि जिस कॉलोनी में वे प्लॉट या फ्लैट ले रहे हैं, वह वैध है या अवैध।

विधानसभा के मानसून सत्र में कॉलोनाइजर एक्ट को मंजूरी मिलने के बाद यह एडवांस सिस्टम पूरी तरह प्रभावी हो जाएगा। इस नए प्लेटफॉर्म पर कॉलोनाइजर लाइसेंस, रेरा रजिस्ट्रेशन और अन्य संबंधित विभागों की मंजूरियों को एक साथ इंटीग्रेटेड किया जा रहा है, जिससे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।


क्या बदलेगा इस नए सिस्टम में?

सॉफ्टवेयर आधारित ऑटो स्क्रूटनी: पुरानी व्यवस्था में बिल्डिंग के नक्शों की जांच इंजीनियर और तकनीकी अधिकारी करते थे, जिससे अक्सर मनमाने ढंग से आपत्तियां लगाने और देरी की गुंजाइश रहती थी। अब पहले चरण की तकनीकी जांच पूरी तरह सॉफ्टवेयर करेगा। नियमों के अनुरूप होने पर नक्शा तुरंत स्वीकार होगा और कमी होने पर सॉफ्टवेयर खुद ऑनलाइन कारण बताएगा।

समय की भारी बचत: पहले फाइल कई स्तरों से गुजरती थी और एक आपत्ति पर प्रक्रिया महीनों लटक जाती थी। अब आवेदन के साथ ही 'ऑटो स्क्रूटनी' हो जाएगी, जिससे त्रुटियां जमा होने से पहले ही सामने आ जाएंगी।

7 प्रमुख विभागों से जुड़ाव: निर्माण कार्य के लिए एनओसी लेने में होने वाली देरी को खत्म करने के लिए इस सिस्टम को राजस्व विभाग, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग , सम्पदा 2.0 (रजिस्ट्री विभाग), एयरपोर्ट अथॉरिटी, और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण जैसे 7 बड़े विभागों से सीधे लिंक किया गया है।

ये हैं 5 बड़े बदलाव

1. पूरी प्रक्रिया होगी डिजिटल: आवेदन करने से लेकर अंतिम अनुमति पत्र मिलने तक पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। कागजी फाइलें जमा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

2. सॉफ्टवेयर पर परखी जाएगी तकनीकी बारीकियां: अपलोड किए गए नक्शे में सेटबैक, एफएआर, भवन की ऊंचाई, ग्राउंड कवरेज और पार्किंग जैसे सभी तकनीकी मानकों की जांच सीधे सॉफ्टवेयर द्वारा की जाएगी।

3. छोटे आवासीय प्लॉटों को 'डीम्ड अप्रूवल': 186 वर्गमीटर (करीब 2,000 वर्गफीट) तक के आवासीय प्लॉट पर निर्धारित शर्तें पूरी होने पर स्वतः मंजूरी मिल जाएगी। वहीं, 300 वर्गमीटर तक के मामलों में अधिकृत आर्किटेक्ट या स्ट्रक्चरल इंजीनियर के डिजिटल सर्टिफिकेशन के आधार पर सीधे काम शुरू किया जा सकेगा।

4. निर्माण के हर चरण की ऑनलाइन निगरानी: प्लिंथ लेवल निरीक्षण, कमेंसमेंट नोटिस, कंप्लीशन रिपोर्ट और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जैसे भवन निर्माण के सभी प्रमुख चरण ऑनलाइन दर्ज होंगे।

5. गलत जानकारी देने पर सख्त एक्शन: नियमों का उल्लंघन करने या गलत जानकारी देने वाले आर्किटेक्ट और इंजीनियरों के लाइसेंस तत्काल निलंबित या निरस्त किए जाएंगे। साथ ही गलत नक्शे पर जारी अनुमति भी रद्द होगी।

यह भी पढ़ें- एमपी में देश का पहला अनोखा प्रयोग, संपत्तियों का बनेगा यूनिक डिजिटल ID, एक ही पोर्टल पर मिलेगी सभी जानकारी

भूमिका बदली, खत्म नहीं होगी सरकारी इंजीनियरों की जिम्मेदारी

इस डिजिटल सिस्टम के बाद यह स्पष्ट किया गया है कि सरकारी इंजीनियरों की भूमिका खत्म नहीं होगी, बल्कि उनका काम अपग्रेड हो जाएगा। फाइलों के रखरखाव और शुरुआती कागजी जांच के बजाय अब सरकारी इंजीनियरों का मुख्य फोकस इन बातों पर रहेगा:

- मौके पर जाकर सीधे फील्ड निरीक्षण करना।

- जटिल, बड़े और विशेष निर्माण मामलों की गहन जांच करना।

- भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा (स्ट्रेक्चुयल सेफ्टी) और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करना।

तकनीकी जानकारों का कहना है कि सरकार का यह कदम पारदर्शिता और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिहाज से क्रांतिकारी है, बशर्ते डिजिटलाइजेशन के शुरुआती चरणों में आने वाली तकनीकी दिक्कतों और सर्वर जैसी समस्याओं को समय रहते दुरुस्त कर लिया जाए।