गैस पीड़ितों के इलाज की पूरी राशि बिना किसी सीमा के जारी करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट निगरानी समिति
समिति ने राज्य सरकार से कहा है कि गैस पीड़ितों के इलाज का पूरा खर्च बिना किसी वित्तीय सीमा (सीलिंग) के वहन किया जाए। कोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन सुन...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 04 Jun 2026 09:53:37 AM (IST)Updated Date: Thu, 04 Jun 2026 09:53:37 AM (IST)
प्रतीकात्मक फोटो, एआई से तैयार की गई है।HighLights
- समिति ने राज्य सरकार से कहा है कि गैस पीड़ितों के इलाज का पूरा खर्च बिना किसी वित्तीय सीमा के उठाएं
- आयुष्मान योजना में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अधिकतम 4 लाख रुपये की सहायता मिल रही है, जो कम है
- गैस पीड़ित निलोफर की मां किडनी दान करने को तैयार हैं, इलाज की राशि न मिलने से ट्रांसप्लांट अटका हुआ है
डिजिटल डेस्क, भोपाल। भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के मुफ्त इलाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने सख्त रुख अपनाया है। समिति ने गैस राहत विभाग को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि पीड़ितों के अस्पताल के इलाज का पूरा खर्च विभाग को उठाना होगा।
कोर्ट के आदेशों के बावजूद आयुष्मान योजना की कमियों और फंड की तय सीमा (सीलिंग) के कारण पीड़ितों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है।
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी, आयुष्मान योजना में फंड की कमी
निगरानी समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.के. अग्रवाल ने मुख्य सचिव को लिखे पत्र में याद दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि सभी गैस पीड़ितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
वर्तमान में, गैस राहत विभाग आयुष्मान योजना के तहत किडनी ट्रांसप्लांट जैसे बड़े इलाजों के लिए अधिकतम 4 लाख रुपये की राशि मंजूर कर रहा है। इसके विपरीत, निजी अस्पतालों में इस इलाज का न्यूनतम खर्च 6.5 लाख रुपये या उससे अधिक है।
निगरानी समिति के सदस्य पूर्णेन्दु शुक्ला ने कहा, "गैस पीड़ित एक विशेष श्रेणी में आते हैं। उन्हें बिना किसी ऊपरी सीमा (सीलिंग) के इलाज के लिए आवश्यक पूरी राशि दी जानी चाहिए।"
निलोफर का मामला: माँ किडनी देने को तैयार, पर पैसे नहीं
समाचार रिपोर्ट में 42 वर्षीय गैस पीड़ित निलोफर का मामला सामने आया है, जो लंबे समय से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सरकारी सहायता का इंतजार कर रही हैं। निजी अस्पताल ने इस इलाज के लिए 6.5 लाख रुपये का एस्टीमेट दिया है, लेकिन विभाग ने केवल 4 लाख रुपये ही मंजूर किए हैं।
निलोफर की माँ उन्हें अपनी एक किडनी देने को तैयार हैं, लेकिन शेष 2.5 लाख रुपये की व्यवस्था न होने के कारण इलाज अधर में लटका हुआ है।
एनजीओ ने दी कोर्ट की अवमानना की चेतावनी
'भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन' की सह-संयोजक रचना ढींगरा ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि गैस पीड़ितों को मुफ्त इलाज न देना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है।
उन्होंने मुख्य सचिव को चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में तुरंत सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो वे अदालत में अवमानना याचिका दायर करेंगी। ढींगरा ने समिति को ऐसे तीन और मामलों की सूची सौंपी है, जहाँ मरीजों को मजबूरन खुद पैसों का इंतजाम करना पड़ा।
विभाग का पक्ष: नियमों में बदलाव की तैयारी
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए गैस राहत विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि वर्तमान में 4 लाख रुपये की सीमा तय है, जो पहले के समय में पर्याप्त होती थी।
हालांकि, उन्होंने आश्वस्त किया कि हाल ही में सामने आई शिकायतों को देखते हुए विभाग अब इस नीति को बदलने और इलाज की सीमा को बढ़ाने पर गंभीरता से काम कर रहा है।