
राज्य ब्यूरो, नवदुनिया, भोपाल। चाहे ग्वालियर में आबकारी, परिवहन, भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त और राजस्व मंडल का मुख्यालय हो या जबलपुर में पावर जनरेटिंग कंपनी का मुख्यालय, ये केवल नाम के हैं। यहां जिन आयुक्तों की नियुक्ति की गई, उनका मोह भोपाल से नहीं छूट पा रहा है। यही वजह है कि वे मुख्यालय में बैठते ही नहीं हैं।
यह अधिकारी भोपाल में ही बैठ कर मुख्यालय का काम संभालते हैं। दरअसल, प्रशासनिक मुख्यालय इसलिए बनाए गए थे कि विकेंद्रीकृत व्यवस्था हो और अन्य शहरों का भी विकास हो, ताकि एक जगह पावर सेंटर बनकर न रह जाए, लेकिन यह अधिकारी सरकार की इस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
निधि निवेदिता को प्रमुख राजस्व आयुक्त के साथ आयुक्त भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त ग्वालियर का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, लेकिन वह भोपाल से ग्वालियर मुख्यालय का काम कर रही हैं। इसी तरह परिवहन विभाग का मुख्यालय भी ग्वालियर में हैं, उमेश जोगा परिवहन आयुक्त हैं लेकिन वह ग्वालियर में नहीं बैठते।
भोपाल के 11 नंबर में एक कार्यालय बना हुआ है वह यहीं से ग्वालियर का मुख्यालय संभालते हैं। आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना भी बिट्टन मार्केट के पास कैंप ऑफिस से सारा कामकाज करते हैं। राजस्व मंडल अध्यक्ष अनिरुद्ध मुखर्जी हैं, लेकिन वह भी अधिकतर भोपाल में ही बैठते हैं।
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इंदौर में श्रम आयुक्त मुख्यालय है। वाणिज्यिक कर का विभागीय मुख्यालय भी इंदौर में है। मप्र राज्य लोक सेवा आयोग की सचिव शीतला पटले को श्रम आयुक्त इंदौर का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। अनय द्विवेदी आयुक्त वाणिज्यिक कर हैं। वह भी इंदौर में ही बैठ रहे हैं, लेकिन अन्य मुख्यालयों में ऐसी स्थिति नहीं है।
प्रदेश के विभिन्न शहरों को महत्व देने के लिए राज्य शासन ने सभी कार्यालयों को भोपाल में ही न रखकर अन्य स्थानों पर फैलाया, लेकिन अधिकारियों का मन अपने मुख्यालय में न लगकर भोपाल में ही लगता है। ऐसे में मुख्यालय का नियंत्रण किसी जूनियर अधिकारी को देकर वे भोपाल में रहते हैं। यह बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। बिना अनुमति मुख्यालय नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए शासन को विचार करना पड़ेगा कि मुख्यालयों में अधिकारियों का बैठना सख्ती से लागू करें। - डीएस राय, मप्र के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी।