
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो से अधिक बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून के प्रासंगिकता खोने की टिप्पणी के बाद मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी के लिए दो बच्चों की शर्त हटाने का मामला फिर सामने आ गया है। यह पांच माह से सहमति के चक्कर में अटका हुआ है, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम में संशोधन के प्रारूप में पुराने प्रविधान को जोड़कर जारी करने पर उसे निरस्त करवा दिया था। तब से यह मामला विधिक अभिमत की प्रक्रिया में ही है।
मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम में प्रविधान है कि यदि नौकरी कर रहे किसी अधिकारी-कर्मचारी का तीसरा बच्चा होता है तो उसे अपात्र मानकर सेवा से हटाया नहीं जाएगा। 26 जनवरी 2001 में तीसरा बच्चा होने पर अपात्र मान लेने की शर्त लागू की गई थी।
इस प्रविधान के चलते स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा विभाग के कर्मचारी नौकरी से हाथ धो चुके हैं। इसमें संशोधन के लिए मुख्यमंत्री ने सामान्य प्रशासन विभाग को मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम में शासकीय नौकरी में दो बच्चों की अधिकतम सीमा संबंधी प्रविधान में संशोधन के निर्देश दिए थे।
प्रस्ताव बना और मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली वरिष्ठ सचिव समिति में विचार के बाद इसे विधिक अभिमत के लिए भेजा गया। मुख्यमंत्री कार्यालय के अपर मुख्य सचिव नीरज मंडलोई मुख्यमंत्री द्वारा निर्धारित प्राथमिकता वाले इस विषय की निगरानी कर रहे हैं और विभाग को शीघ्र कैबिनेट में नियम में संशोधन का प्रस्ताव रखने के लिए कहा है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि नीतिगत निर्णय के लिए नियम का प्रारूप रोका गया है।
मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम 1961 के नियमों के तहत 26 जनवरी 2001 या उसके बाद दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवार शासकीय सेवा के लिए अपात्र माने जाते हैं। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के तहत शासकीय सेवक के दो से अधिक बच्चे होने को कदाचार की श्रेणी में रखा गया है।
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