
सुशील पांडेय, नवदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक और पुरातात्विक संपदा जल्द ही देश की राजधानी नई दिल्ली में वैश्विक पटल पर अपनी चमक बिखेरती नजर आएगी। राज्य से प्राप्त दो दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमाओं चौथी शताब्दी की 'कार्तिकेय' और ग्यारहवीं शताब्दी की 'यज्ञ वराह' का चयन विश्व के सबसे बड़े युगे युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय के लिए किया गया है। सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत नार्थ और साउथ ब्लॉक में बनाए गए इस विशाल संग्रहालय में प्राचीन भारतीय मूर्तिकला पर आधारित एक विशेष गैलरी बनाई जा रही है, जिसके लिए एमपी की दो प्रतिमाओं का चयन हुआ है।
अन्य राज्यों से भी प्रतिमाओं का चयन किया जा रहा है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के प्रस्ताव पर मध्य प्रदेश शासन ने अपनी औपचारिक सहमति दे दी है। अब इन दोनों उत्कृष्ट कलाकृतियों को दिल्ली भेजने की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू हो गई है। नई दिल्ली में इन दोनों प्रतिमाओं का प्रदर्शन मप्र के समृद्ध इतिहास और बेजोड़ स्थापत्य कला को पर्यटकों और शोधकर्ताओं के सामने नए आयाम में प्रस्तुत करेगा।
राज्य संग्रहालय, भोपाल और विदिशा जिला पुरातात्विक संग्रहालय की क्यूरेटर नम्रता यादव ने बताया कि राज्य संग्रहालय में संरक्षित भगवान कार्तिकेय की यह दुर्लभ द्विभुजी प्रतिमा चौथी शताब्दी (गुप्त काल) की मानी जाती है। यह प्रतिमा मंदसौर के गजेंद्र घाट से उत्खनन के दौरान प्राप्त हुई थी। कलात्मक दृष्टि से यह स्थानक मुद्रा (खड़ी मुद्रा) में गढ़ी गई है। यद्यपि प्रतिमा की दाईं भुजा खंडित है, किंतु बाईं भुजा में कुक्कुट (मुर्गा) स्पष्ट देखा जा सकता है।
प्रतिमा के गले में एकावली हार, कानों में विशाल कर्ण-कुंडल, उत्तरीय वस्त्र और अधोवस्त्र की बारीक नक्काशी उस दौर के उन्नत शिल्प कौशल का प्रमाण है। मस्तक पर उकेरी गई त्रिशिखी केश-सज्जा इसे अत्यंत विशिष्ट स्वरूप देती है। यह ऐतिहासिक प्रतिमा वर्ष 2013 में बेल्जियम के ब्रुसेल्स में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी द बाडी इन इंडियन आर्ट में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है।
दूसरी चयनित धरोहर विदिशा जिला पुरातात्विक संग्रहालय में संरक्षित 10वीं-11वीं शताब्दी की बलुआ पत्थर से निर्मित ''यज्ञ वराह'' की प्रतिमा है। विदिशा के सोनारी गांव के निकट केवटन नदी से प्राप्त यह प्रतिमा आंशिक रूप से खंडित होने के बावजूद मध्यकालीन मूर्तिकला का अप्रतिम उदाहरण है। भगवान विष्णु के वराह अवतार पर आधारित इस महाकाय प्रतिमा के समूचे शरीर पर सूक्ष्म नक्काशी के जरिए पृथ्वी, नवग्रह, शेषनाग और 33 कोटि देवी-देवताओं का अंकन किया गया है।
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नम्रता यादव के अनुसार, यह प्रतिमा वर्ष 2023 में मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में आयोजित वैश्विक प्रदर्शनी 'एंशिएंट स्कल्पचर: इंडिया, इजिप्ट, सीरिया, ग्रीस एंड रोम' में भी शामिल की गई थी। विश्व भर से आमंत्रित चुनिंदा कलाकृतियों में भारत से चयनित दो मास्टरपीस में से यह एक थी, जो वहां 11 महीनों तक प्रदर्शित रही।
संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार से मिले दो प्रतिमाओं को लोन पर लेने के प्रस्ताव अनुसार चयनित दोनों प्रतिमाओं के प्रदर्शन की मप्र शासन ने सहमति दे दी है। प्रतिमाओं के परीक्षण और प्रदर्शन हेतु ले जाने के लिए दिल्ली से टीम आने वाली है। वह यह तय करेगी की प्रतिमाओं को कब और कैसे ले जाना है। दोनों प्रतिमाएं वहां कब तक रहेंगी, यह अभी तय नहीं है।- डॉ. मनीषा शर्मा, संयुक्त संचालक, संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय मप्र