
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। आलीराजपुर, इंदौर, हरदा और नर्मदापुरम सहित 12 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई है। ऐसे में सरकार इस बार गेहूं और ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती को हतोत्साहित करेगी। दरअसल, इन फसलों की सिंचाई में अधिक पानी लगता है। मूंग में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित हो रही है। भारत सरकार ने पैराक्वेट डाइक्लोराइड कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाया है।
मध्य प्रदेश सरकार ने भी इसके उपयोग पर रोक लगाते हुए इससे हुई उपज के भंडार नष्ट करने के निर्देश दिए हैं। इस कीटनाशक के छिड़काव से मूंग के पौधे 24 से 72 घंटों में सूख जाते हैं। इसके अवशेष वाली मूंग के सेवन या संपर्क से फेफड़े, किडनी, लिवर और मस्तिष्क को गंभीर नुकसान हो सकता है। कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं। यह कीटनाशक 70 देशों में प्रतिबंधित है।
नर्मदापुरम, हरदा, नरसिंहपुर, रायसेन और सीहोर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती की जाती है। 60 से 70 दिन की इस फसल को पांच से छह बार पानी देना पड़ता है। हरदा, नर्मदापुरम और रायसेन के किसान हर साल तवा और बारना जलाशयों से पानी छोड़ने की मांग करते हैं। कम वर्षा के कारण तवा 87.8 प्रतिशत और बारना 69.1 प्रतिशत ही भर पाए हैं। इन क्षेत्रों में गेहूं की खेती भी होती है, जिसमें सिंचाई की जरूरत अधिक रहती है।
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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कृषि विभाग के अधिकारियों को कम पानी वाली फसलों के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाने और मूंग की खेती के नुकसान किसानों को समझाने के निर्देश दिए। किसानों को उड़द की खेती के लिए प्रेरित किया जाएगा और सरकार पूरी उपज खरीदेगी। चना सहित अन्य फसलें भी ली जा सकती हैं।
किसानों के दबाव में सरकार ग्रीष्मकालीन मूंग खरीदती है लेकिन आगे उसके खरीदार नहीं मिलते। गोदामों में तीन-चार साल की पौने चार लाख टन मूंग अब भी रखी है।